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Ankur Mishra
kaash thoda KHud se ham bhi raabta rakhte
kaash thoda KHud se ham bhi raabta rakhte | काश थोड़ा ख़ुद से हम भी राब्ता रखते
- Ankur Mishra
काश
थोड़ा
ख़ुद
से
हम
भी
राब्ता
रखते
दरमियाँ
दोनों
के
इक
तो
आइना
रखते
इस
तरह
होती
न
तन्हा
यार
तन्हाई
हम
अगर
ख़ाली
न
दिल
ये
जा-ब-जा
रखते
मुतमइन
हैं
अश्क
'अंकुर'
बह
निकलते
हैं
किस
तरह
होंठों
पे
भीगी
हम
सदा
रखते
- Ankur Mishra
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मुकम्मल
कुछ
नहीं
होता
लहू
कोई
नहीं
धोता
किसी
को
क्या
कहूँ
मैं
अब
मैं
ख़ुद
भी
तो
नहीं
रोता
जिसे
देखो
है
तन्हा
पर
जुदा
कोई
नहीं
होता
है
परखा
मैंने
ख़ुद
को
भी
कोई
अपना
नहीं
होता
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ख़ुद
से
जो
हम
बेख़बर
रहने
लगे
थे
अश्क
इन
आँखों
से
फिर
बहने
लगे
थे
करते
क्या
शिकवा
किसी
से
हम
यहाँ
अब
तंज़
सारे
हम
ही
जब
सहने
लगे
थे
बाद
बरसों
के
तो
आया
था
ये
लम्हा
बाद
बरसों
के
वो
कुछ
कहने
लगे
थे
ख़्वाह
मख़ाह
ही
छोड़
आया
शहर
वो
मैं
यार
अब
तो
दिल
में
वो
रहने
लगे
थे
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अब
भी
वो
वा'दा
निभाए
जा
रहे
हैं
नाम
उसका
हम
छुपाए
जा
रहे
हैं
आँखों
से
बहने
लगा
है
दर्द
मेरा
इस
तरह
हम
आजमाए
जा
रहे
हैं
जाने
ख़ुद
को
खो
दिया
मैंने
कहाँ
पर
कबसे
ख़ुद
को
हम
रुलाए
जा
रहे
हैं
बरसों
से
देखा
नहीं
आईना
हमने
कबसे
बस
पलके
भिगाए
जा
रहे
हैं
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ख़ुद
को
गुमराह
करते
हुए
लोग
ज़िंदा
हैं
मरते
हुए
दें
किसे
कोई
इल्ज़ाम
हम
बिख़रे
हैं
हम
सँवरते
हुए
टूटते
हैं
सनम
ख़्वाब
से
दिल
यहाँ
प्यार
करते
हुए
डूब
जाएँ
न
दोनों
कहीं
प्यास
से
प्यास
भरते
हुए
बेसबब
लौट
आई
तिरी
याद
फिर
याद
करते
हुए
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बा-ख़ुदा
इस
बे-ख़ुदी
से
बच
न
पाए
ज़िंदगी
से
है
अज़िय्यत
भी
मोहब्बत
पूछ
ले
इस
बेबसी
से
ख़ामख़ाँ
करते
रहे
हम
यार
तौबा
ख़ुद-कुशी
से
रक़्स
करती
ये
हवाएँ
फिर
चली
हैं
उस
गली
से
बे-ख़बर
हैं
तितलियाँ
भी
जान
मेरी
उस
कली
से
किस
तरह
करते
वफ़ा
हम
यार
तेरी
दिल-लगी
से
रहनुमा
है
हम-नशीं
वो
रोज़
कहते
हैं
उसी
से
इसलिए
शायद
कभी
हम
मिल
न
पाए
बे-कली
से
रह
गए
कुछ
फ़ासले
भी
यार
'अंकुर'
की
कमी
से
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