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Ankur Mishra
mukammal kuchh nahin hota
mukammal kuchh nahin hota | मुकम्मल कुछ नहीं होता
- Ankur Mishra
मुकम्मल
कुछ
नहीं
होता
लहू
कोई
नहीं
धोता
किसी
को
क्या
कहूँ
मैं
अब
मैं
ख़ुद
भी
तो
नहीं
रोता
जिसे
देखो
है
तन्हा
पर
जुदा
कोई
नहीं
होता
है
परखा
मैंने
ख़ुद
को
भी
कोई
अपना
नहीं
होता
- Ankur Mishra
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अब
बिछड़ने
पर
समझ
पाते
हैं
हम
इक
दूसरे
को
इम्तिहाँ
के
ख़त्म
हो
जाने
पे
हल
याद
आ
रहा
है
Nishant Singh
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घर
की
इस
बार
मुकम्मल
मैं
तलाशी
लूँगा
ग़म
छुपा
कर
मिरे
माँ
बाप
कहाँ
रखते
थे
Unknown
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दुश्मनी
लाख
सही
ख़त्म
न
कीजे
रिश्ता
दिल
मिले
या
न
मिले
हाथ
मिलाते
रहिए
Nida Fazli
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तमाम
शहर
की
ख़ातिर
चमन
से
आते
हैं
हमारे
फूल
किसी
के
बदन
से
आते
हैं
Farhat Ehsaas
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दिल-ए-नादाँ
तुझे
हुआ
क्या
है
आख़िर
इस
दर्द
की
दवा
क्या
है
Mirza Ghalib
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चलता
रहने
दो
मियाँ
सिलसिला
दिलदारी
का
आशिक़ी
दीन
नहीं
है
कि
मुकम्मल
हो
जाए
Abbas Tabish
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शरीफ़
इंसान
आख़िर
क्यूँ
इलेक्शन
हार
जाता
है
किताबों
में
तो
ये
लिक्खा
था
रावन
हार
जाता
है
Munawwar Rana
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दिल
के
तमाम
ज़ख़्म
तेरी
हाँ
से
भर
गए
जितने
कठिन
थे
रास्ते
वो
सब
गुज़र
गए
Kumar Vishwas
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मैं
तमाम
दिन
का
थका
हुआ
तू
तमाम
शब
का
जगा
हुआ
ज़रा
ठहर
जा
इसी
मोड़
पर
तेरे
साथ
शाम
गुज़ार
लूँ
Bashir Badr
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किसी
बहाने
से
उसकी
नाराज़गी
ख़त्म
तो
करनी
थी
उसके
पसंदीदा
शाइर
के
शे'र
उसे
भिजवाए
हैं
Ali Zaryoun
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ज़िंदगी
से
सनम
ज़िंदगी
के
लिए
लोग
लड़ते
हैं
झूठी
ख़ुदी
के
लिए
ज़ेहन
पे
ज़ख़्म
उल्फ़त
का
तामीर
हो
ये
ज़रूरी
नहीं
ख़ुद-कुशी
के
लिए
ख़ुश्क
यादों
की
ख़ातिर
बशर
बेसबब
आँख
रोई
ज़रा
सी
नमी
के
लिए
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Ankur Mishra
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एक
तू
और
तेरी
कमी
से
है
अँधेरा
बहुत
रौशनी
से
किस
तरह
कोई
वा'दा
निभाऊँ
जान
जाती
नहीं
ख़ुद-कुशी
से
ज़ुर्म
को
ज़ुर्म
साबित
करे
क्यूँ
क्यूँ
करें
हम
मोहब्बत
तुझी
से
है
लकीरों
में
ही
फ़ासला
जब
किसलिए
दिल-लगी
ज़िंदगी
से
क़त्ल
होना
है
फ़ितरत
में
मेरी
ये
बताना
है
'अंकुर'
किसी
से
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Ankur Mishra
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इश्क़
में
अब
ख़सारे
बहुत
हैं
लोग
उल्फ़त
में
हारे
बहुत
हैं
रहने
दो
छोड़ो
क़िस्सा
वो
अब
तुम
दरिया
के
इस
किनारे
बहुत
हैं
कैसे
आऊँ
मैं
फिर
उस
गली
अब
ज़ख़्म
हमको
ये
प्यारे
बहुत
हैं
बरसों
देखा
नहीं
ख़्वाब
कोई
आँखों
में
सपने
ख़ारे
बहुत
हैं
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Ankur Mishra
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इसलिए
कोई
ठहरा
नहीं
इश्क़
था
पर
भरोसा
नहीं
और
हैं
ख़्वाब
इन
आँखों
में
एक
तू
ही
अकेला
नहीं
छोड़
दूँ
जीना
कहते
हो
क्यूँ
ज़ख़्म
इतना
भी
गहरा
नहीं
एक
मुद्दत
से
सोया
हूँ
मैं
मौत
पे
कोई
पहरा
नहीं
ख़ामख़ाँ
जाँ
लुटा
दी
बशर
लौट
कर
कोई
आया
नहीं
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Ankur Mishra
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दर्द
से
लबरेज़
रहने
दो
अश्क
ये
आँखों
से
बहने
दो
फिर
नहीं
होनी
मोहब्बत
ये
लाश
अरमानों
की
दहने
दो
कब
से
चुप
हैं
आँखें
दोनों
ये
कुछ
इन्हें
भी
अब
तो
कहने
दो
जाने
मिलना
हो
न
दोबारा
अब
तो
ये
दीवार
ढ़हने
दो
चाहा
वा'दा
कब
कोई
यारा
दर्द
मुझको
तुम
ये
सहने
दो
मत
करो
इतनी
मोहब्बत
तुम
मुझको
अब
बेज़ार
रहने
दो
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Ankur Mishra
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