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Ankur Mishra
zulfon men apni saja kar
zulfon men apni saja kar | ज़ुल्फ़ों में अपनी सजा कर
- Ankur Mishra
ज़ुल्फ़ों
में
अपनी
सजा
कर
ले
गया
मुझको
चुरा
कर
देखता
हूँ
रास्ता
मैं
सामने
उसको
बिठा
कर
काट
ली
अपनी
कलाई
नाम
फिर
उसका
मिटा
कर
सोचता
हूँ
कैसे
होगा
मसअला
हल
ज़हर
खा
कर
लौट
आ
ऐ
ज़िंदगी
अब
हाथ
'अंकुर'
से
छुड़ा
कर
- Ankur Mishra
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इश्क़
तन्हा
रात
प्यासी
है
क्यूँ
मोहब्बत
आज़माती
है
तोड़
तो
दूँ
ख़ामुशी
लेकिन
मसअला
थोड़ा
सियासी
है
लड़
रहा
हूँ
ख़ुद
से
जाने
क्यूँ
आग
ये
किसने
लगाई
है
पार
दरिया
कर
लिया
लेकिन
कश्ती
हमने
ही
डुबोई
है
पूछती
है
ज़िंदगी
मुझ
सेे
क्यूँ
क़सम
उसकी
दिलाई
है
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Ankur Mishra
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अपनी
भी
अब
इक
कहानी
चाहिए
फिर
वही
मुझको
जवानी
चाहिए
पास
सब
कुछ
है
मिरी
मुझको
मगर
उसकी
कोई
इक
निशानी
चाहिए
रंग
ख़ुद
भर
दूँगा
मैं
पहले
मगर
रात
दीवानी
वो
आनी
चाहिए
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आख़िरी
ख़त
आख़िरी
पैग़ाम
है
मुझ
पे
मेरे
क़त्ल
का
इल्ज़ाम
है
सो
गए
मुझको
जगा
के
ख़्वाब
भी
किस
क़दर
तन्हा
ये
सुब्ह-ओ-शाम
है
ख़ामख़ाँ
करता
रहा
फ़रियाद
मैं
दर्द
देना
ही
तो
उसका
काम
है
जुर्म
साबित
हो
नहीं
पाया
कभी
मय-कदों
में
आना
जाना
आम
है
थी
मोहब्बत
यूँँ
तो
उसको
भी
मगर
नाम
'अंकुर'
बस
मिरा
बदनाम
है
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फिर
वही
इल्ज़ाम
आया
है
फिर
कोई
पैग़ाम
लाया
है
हम
तो
भूले
बैठे
थे
उनको
फिर
हमें
किसने
रुलाया
है
मैं
कहाँ
से
लाऊँ
वो
रातें
ये
मुझे
किसने
बुलाया
है
मैं
तो
कब
का
मर
चुका
था
फिर
ये
मुझे
किसने
जगाया
है
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ग़म-ए-उल्फ़त
उठाए
फिरते
हैं
दर्द
अपना
छुपाए
फिरते
हैं
होना
कुछ
है
नहीं
उसे
पाकर
जान
अपनी
बनाए
फिरते
हैं
कहो
उस
सेे
न
ले
वो
नाम
मेरा
लोग
ख़ंजर
छुपाए
फिरते
हैं
जाने
किसके
सर
आए
ख़ून
मेरा
घात
गुल
भी
लगाए
फिरते
हैं
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