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Ankur Mishra
gham-e-ulfat uth
gham-e-ulfat uth | ग़म-ए-उल्फ़त उठाए फिरते हैं
- Ankur Mishra
ग़म-ए-उल्फ़त
उठाए
फिरते
हैं
दर्द
अपना
छुपाए
फिरते
हैं
होना
कुछ
है
नहीं
उसे
पाकर
जान
अपनी
बनाए
फिरते
हैं
कहो
उस
सेे
न
ले
वो
नाम
मेरा
लोग
ख़ंजर
छुपाए
फिरते
हैं
जाने
किसके
सर
आए
ख़ून
मेरा
घात
गुल
भी
लगाए
फिरते
हैं
- Ankur Mishra
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दर्द
सहने
का
अलग
अंदाज़
है
जी
रहे
हैं
हम
अदा
की
ज़िंदगी
Farhat Abbas Shah
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ग़म-ए-हयात
ने
आवारा
कर
दिया
वर्ना
थी
आरज़ू
कि
तिरे
दर
पे
सुब्ह
ओ
शाम
करें
Majrooh Sultanpuri
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कोई
अटका
हुआ
है
पल
शायद
वक़्त
में
पड़
गया
है
बल
शायद
दिल
अगर
है
तो
दर्द
भी
होगा
इस
का
कोई
नहीं
है
हल
शायद
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Gulzar
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हम
कुछ
ऐसे
उसके
आगे
अपनी
वफ़ा
रख
देते
हैं
बच्चे
जैसे
रेल
की
पटरी
पर
सिक्का
रख
देते
हैं
तस्वीर-ए-ग़म,
दिल
के
आँसू,
रंजो-नदामत,
तन्हाई
उसको
ख़त
लिखते
हैं
ख़त
में
हम
क्या
क्या
रख
देते
हैं
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Subhan Asad
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तू
है
सूरज
तुझे
मालूम
कहाँ
रात
का
दुख
तू
किसी
रोज़
मेरे
घर
में
उतर
शाम
के
बाद
Farhat Abbas Shah
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मशहूर
भी
हैं
बदनाम
भी
हैं
ख़ुशियों
के
नए
पैग़ाम
भी
हैं
कुछ
ग़म
के
बड़े
इनाम
भी
हैं
पढ़िए
तो
कहानी
काम
की
है
Anjum Barabankvi
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ज़ख़्म
है
दर्द
है
दवा
भी
है
जैसे
जंगल
है
रास्ता
भी
है
यूँँ
तो
वादे
हज़ार
करता
है
और
वो
शख़्स
भूलता
भी
है
हम
को
हर
सू
नज़र
भी
रखनी
है
और
तेरे
पास
बैठना
भी
है
यूँँ
भी
आता
नहीं
मुझे
रोना
और
मातम
की
इब्तिदा
भी
है
चूमने
हैं
पसंद
के
बादल
शाम
होते
ही
लौटना
भी
है
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Karan Sahar
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पास
जब
तक
वो
रहे
दर्द
थमा
रहता
है
फैलता
जाता
है
फिर
आँख
के
काजल
की
तरह
Parveen Shakir
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ये
ग़म
हमको
पत्थर
कर
देगा
इक
दिन
कोई
आ
कर
हमें
रुलाओ
पहले
तो
Siddharth Saaz
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कहीं
से
दुख
तो
कहीं
से
घुटन
उठा
लाए
कहाँ-कहाँ
से
न
दीवानापन
उठा
लाए
अजीब
ख़्वाब
था
देखा
के
दर-ब-दर
हो
कर
हम
अपने
मुल्क
से
अपना
वतन
उठा
लाए
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Farhat Abbas Shah
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जुगनुओं
की
तरह
ख़ामुशी
से
जल
रहा
हूँ
तिरी
रौशनी
से
तेज
है
धूप
ये
ख़्वाहिशों
की
भीग
जाऊँ
न
मैं
तिश्नगी
से
रोज़
देती
है
दस्तक
नई
इक
ज़िंदगी
खिड़कियों
पे
ख़ुशी
से
हो
गया
हूँ
मैं
आज़िज
बशर
इस
बेमुरव्वत
तिरी
बे-ख़ुदी
से
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Ankur Mishra
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अब
मेरी
अमान
में
नहीं
आता
वो
तीर
कमान
में
नहीं
आता
बरसों
मैं
सफ़र
में
था
कभी
लेकिन
वो
मेरी
ज़मान
में
नहीं
आता
अब
किस
सेे
कहूँ
मैं
हाल
ये
अपना
ये
दर्द
अमान
में
नहीं
आता
जाने
दी
है
किसने
बद्दुआ
मुझको
दिल
कब
से
ज़मान
में
नहीं
आता
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Ankur Mishra
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ख़ुद
से
ही
जैसे
अंजान
थे
घर
में
अपने
ही
मेहमान
थे
पूछते
हो
पता
जिसका
तुम
हम
कभी
उसकी
पहचान
थे
देख
कर
मुझको
यूँँ
हारते
जीतने
वाले
हैरान
थे
मिल
न
पाए
दुबारा
कभी
रास्ते
वो
जो
आसान
थे
ख़ुद-कुशी
सोचा
कर
लूँ
मगर
सैकड़ों
दिल
में
अरमान
थे
छोड़
आया
उसे
तन्हा
ही
जिसकी
ख़ातिर
परेशान
थे
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Ankur Mishra
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छोटी
छोटी
मुलाक़ातों
में
है
बस
मज़ा
मिलने
का
रातों
में
है
जल
उठे
हैं
दिए
यादों
के
फिर
आग
ही
इतनी
बरसातों
में
है
उतरे
कैसे
नशा
इश्क़
का
अब
ख़ामुशी
इतनी
जब
बातों
में
है
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Ankur Mishra
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फिर
वही
इल्ज़ाम
आया
है
ले
के
वो
पैग़ाम
आया
है
क्यूँ
न
सोचूँ
उसको
मैं
यारों
हिस्से
जब
ये
काम
आया
है
जाने
फिर
कब
राब्ता
हो
ये
हो
के
वो
बदनाम
आया
है
छोड़ो
क़िस्सा
ये
पुराना
अब
ले
के
वो
फिर
जाम
आया
है
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Ankur Mishra
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