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Ankur Mishra
phir vahii ilzaam aaya hai
phir vahii ilzaam aaya hai | फिर वही इल्ज़ाम आया है
- Ankur Mishra
फिर
वही
इल्ज़ाम
आया
है
ले
के
वो
पैग़ाम
आया
है
क्यूँ
न
सोचूँ
उसको
मैं
यारों
हिस्से
जब
ये
काम
आया
है
जाने
फिर
कब
राब्ता
हो
ये
हो
के
वो
बदनाम
आया
है
छोड़ो
क़िस्सा
ये
पुराना
अब
ले
के
वो
फिर
जाम
आया
है
- Ankur Mishra
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इसलिए
इतना
अँधेरा
है
मियाॅं
हर
तरफ़
ख़्वाबों
का
घेरा
है
मियाॅं
किस
तरह
ख़ुद
से
बढ़ाऊॅं
राब्ता
शब
के
पहलू
में
सवेरा
है
मियाॅं
एक
मुद्दत
से
हैं
नम
ऑंखें
मिरी
एक
मुद्दत
से
वो
मेरा
है
मियाॅं
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तेरे
ख़्वाबों
की
तासीर
से
लोग
वाक़िफ़
हैं
ज़ंजीर
से
एक
मुद्दत
हुई
इस
तरह
ज़ख़्म
खाए
मुझे
तीर
से
ढूँढ़
लेते
हैं
दर्द-ए-सुख़न
अश्क
मिल
के
सनम
मीर
से
मुस्तक़िल
लड़
रहा
हूँ
बशर
मैं
मिरी
तन्हा
तक़दीर
से
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मुझे
भी
तू
तेरा
तलबगार
कर
दे
मैं
मर
जाऊँ
इतना
तू
बीमार
कर
दे
है
वा'दा
नहीं
आऊँगा
लौट
कर
मैं
तू
भी
दिल
को
तेरे
ख़बर-दार
कर
दे
मुसाफ़िर
हूँ
मैं
दूर
जाना
है
मुझको
किनारे
मिरी
कश्ती
पतवार
कर
दे
तिरे
बाद
भी
मैं
तिरा
ही
रहूँ
बस
मुझे
इतना
मजबूर
तू
यार
कर
दे
नशा
है
बहुत
इस
मोहब्बत
में
'अंकुर'
गुनहगार
मेरा
भी
किरदार
कर
दे
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लाद
कर
ज़िंदगी
को
शाने
पे
हैं
खड़े
मौत
के
मुहाने
पे
हर्फ़
दर
हर्फ़
ख़ामुशी
है
बस
लफ़्ज़
बहके
न
लड़खड़ाने
पे
किस
तरह
राब्ते
बढ़ाऊँ
मैं
रूठ
जाता
है
वो
मनाने
पे
अश्क
आँखों
में
रह
गए
तन्हा
एक
क़तरा
नहीं
मुहाने
पे
ये
ज़रूरी
नहीं
मिले
दिल
भी
हाथ
अंकुर
यहाँ
मिलाने
पे
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जुगनुओं
की
तरह
ख़ामुशी
से
जल
रहा
हूँ
तिरी
रौशनी
से
तेज
है
धूप
ये
ख़्वाहिशों
की
भीग
जाऊँ
न
मैं
तिश्नगी
से
रोज़
देती
है
दस्तक
नई
इक
ज़िंदगी
खिड़कियों
पे
ख़ुशी
से
हो
गया
हूँ
मैं
आज़िज
बशर
इस
बेमुरव्वत
तिरी
बे-ख़ुदी
से
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Ankur Mishra
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