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Ankur Mishra
Jignuon ki tarah khanushi se
जुगनुओं की तरह ख़ामुशी से
- Ankur Mishra
जुगनुओं
की
तरह
ख़ामुशी
से
जल
रहा
हूँ
तिरी
रौशनी
से
तेज
है
धूप
ये
ख़्वाहिशों
की
भीग
जाऊँ
न
मैं
तिश्नगी
से
रोज़
देती
है
दस्तक
नई
इक
ज़िंदगी
खिड़कियों
पे
ख़ुशी
से
हो
गया
हूँ
मैं
आज़िज
बशर
इस
बेमुरव्वत
तिरी
बे-ख़ुदी
से
- Ankur Mishra
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हाथ
में
जो
ये
शमशीर
है
क्या
यही
मेरी
तक़दीर
है
साथ
जिसके
है
वो
आज
कल
मैं
नहीं
मेरी
तस्वीर
है
नाम
लिखना
था
दिल
पे
मगर
पाँव
में
उसके
ज़ंजीर
है
उड़
चला
फिर
परिंदा
कहीं
आसमाँ
किसकी
जागीर
है
पूछा
है
नाम
मुझ
सेे
मिरा
मसअला
थोड़ा
गम्भीर
है
क्या
कहूँ
कैसे
गुज़री
है
शब
इश्क़
महँगी
बड़ी
पीर
है
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मुस्कुराने
की
जो
आदत
है
छोड़
दो
हाकिम
बुरी
लत
है
डूब
जाएँगे
वो
सहरा
में
प्यास
ये
जिनकी
बदौलत
है
इन
अँधेरों
से
चराग़ों
का
इस
तरह
मिलना
कयामत
है
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उम्र
भर
ये
ख़ुमारी
रहेगी
रात
हम
पे
ये
तारी
रहेगी
छोड़
दी
है
मोहब्बत
मगर
ये
आँख
अब
यूँँ
ही
ख़ारी
रहेगी
मैं
करूँँ
क्या
गिला
अब
किसी
से
जंग
ख़ुद
से
ये
जारी
रहेगी
हम
सेे
हैं
वो
ख़फ़ा
फिर
भी
अंकुर
उन
सेे
क़ाएम
ये
यारी
रहेगी
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मय-कदों
में
मय-कशी
से
प्यास
बढ़ती
है
नमी
से
जानता
हूँ
बे-ख़बर
है
आँख
तेरी
तिश्नगी
से
आदमी
हूँ
है
ख़ता
क्या
पूछना
है
ज़िंदगी
से
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ज़ुल्फ़ों
में
अपनी
सजा
कर
ले
गया
मुझको
चुरा
कर
देखता
हूँ
रास्ता
मैं
सामने
उसको
बिठा
कर
काट
ली
अपनी
कलाई
नाम
फिर
उसका
मिटा
कर
सोचता
हूँ
कैसे
होगा
मसअला
हल
ज़हर
खा
कर
लौट
आ
ऐ
ज़िंदगी
अब
हाथ
'अंकुर'
से
छुड़ा
कर
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Ankur Mishra
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