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Ankur Mishra
muskuraane kii jo aadat hai
muskuraane kii jo aadat hai | मुस्कुराने की जो आदत है
- Ankur Mishra
मुस्कुराने
की
जो
आदत
है
छोड़
दो
हाकिम
बुरी
लत
है
डूब
जाएँगे
वो
सहरा
में
प्यास
ये
जिनकी
बदौलत
है
इन
अँधेरों
से
चराग़ों
का
इस
तरह
मिलना
कयामत
है
- Ankur Mishra
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अब
मेरी
अमान
में
नहीं
आता
वो
तीर
कमान
में
नहीं
आता
बरसों
मैं
सफ़र
में
था
कभी
लेकिन
वो
मेरी
ज़मान
में
नहीं
आता
अब
किस
सेे
कहूँ
मैं
हाल
ये
अपना
ये
दर्द
अमान
में
नहीं
आता
जाने
दी
है
किसने
बद्दुआ
मुझको
दिल
कब
से
ज़मान
में
नहीं
आता
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बस
सफ़र
ही
कर
रहा
हूँ
धीरे
धीरे
मर
रहा
हूँ
हाथ
में
कुछ
है
नहीं
पर
खोने
से
क्या
डर
रहा
हूँ
इक
ही
तो
था
यार
मेरा
ढूँढ़
जिसका
घर
रहा
हूँ
अब
करूँँ
किस
सेे
वफ़ा
मैं
इश्क़
ख़ुद
से
कर
रहा
हूँ
कब
उसे
देखा
नहीं
पर
ख़्वाब
उसी
के
भर
रहा
हूँ
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आदमी
आदमी
का
ख़रीदार
है
दुनिया
दुनिया
नहीं
एक
बाज़ार
है
बैठे
हैं
हाथ
में
सब
तराज़ू
लिए
कौन
किस
का
यहाँ
पे
मददगार
है
रोज़
उठता
है
साहिब
जनाज़ा
नया
शहर
का
शहर
ही
जैसे
बीमार
है
लब
कोई
खोलता
ही
नहीं
क्या
करें
ज़िंदगी
जान
लेने
को
तैयार
है
दोस्त
है
एक
दुश्मन
सरीखे
मिरा
मुद्दतों
से
बशर
जो
मिरा
यार
है
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दिल
दुखा
कर
भी
ठहरा
हुआ
है
किस
क़दर
इश्क़
गहरा
हुआ
है
मुझ
सेे
मत
पूछो
अब
हाल
मेरा
ये
समुंदर
भी
सहरा
हुआ
है
सच
कहूँ
पास
कुछ
भी
नहीं
पर
दर्द
कब
से
ये
ठहरा
हुआ
है
मैं
निकल
आया
उस
दर
से
भी
अब
जब
से
खिड़की
पे
पहरा
हुआ
है
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किस
से
हाल-ए-दिल
ये
कहते
बाद
उसके
कैसे
रहते
मर
गया
जब
मुझ
में
मैं
ही
अश्क
ये
फिर
कैसे
बहते
कर
लिया
फिर
ख़ुद
को
पत्थर
ज़ख़्म
कितने
और
सहते
बरसों
से
हैं
तन्हा
'अंकुर'
कैसे
बिन
अब
ख़ुद
के
रहते
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