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Ankur Mishra
dil dukha kar bhi thehra hua hai
dil dukha kar bhi thehra hua hai | दिल दुखा कर भी ठहरा हुआ है
- Ankur Mishra
दिल
दुखा
कर
भी
ठहरा
हुआ
है
किस
क़दर
इश्क़
गहरा
हुआ
है
मुझ
सेे
मत
पूछो
अब
हाल
मेरा
ये
समुंदर
भी
सहरा
हुआ
है
सच
कहूँ
पास
कुछ
भी
नहीं
पर
दर्द
कब
से
ये
ठहरा
हुआ
है
मैं
निकल
आया
उस
दर
से
भी
अब
जब
से
खिड़की
पे
पहरा
हुआ
है
- Ankur Mishra
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दुनिया
के
ताने
सह
लेता
हूँ
इक
अच्छा
बेटा
कहलाना
है
Neeraj Neer
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'फ़ैज़'
थी
राह
सर-ब-सर
मंज़िल
हम
जहाँ
पहुँचे
कामयाब
आए
Faiz Ahmad Faiz
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उतर
कर
आसमानों
से
ज़मीं
की
ख़ाक
पर
बैठो
ख़ुदा
ने
सब
सेे
ऊँची
आपको
मसनद
अता
की
है
Pawan mahabodhi
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खड़ा
हूँ
आज
भी
रोटी
के
चार
हर्फ़
लिए
सवाल
ये
है
किताबों
ने
क्या
दिया
मुझ
को
Nazeer Baaqri
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इस
का
अपनी
ही
रवानी
पर
नहीं
है
इख़्तियार
ज़िंदगी
शिव
की
जटाओं
में
है
गंगा
की
तरह
Ayush Charagh
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जब
तक
जला
ये
हम
भी
जले
इसके
साथ
साथ
जब
बुझ
गया
चराग़
तो
सोना
पड़े
हमें
Abbas Qamar
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उदासी
का
सबब
दो
चार
ग़म
होते
तो
कह
देता
फ़ुलाँ
को
भूल
बैठा
हूँ
फ़ुलाँ
की
याद
आती
है
Ashu Mishra
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दुख
तो
बहुत
मिले
हैं
मोहब्बत
नहीं
मिली
यानी
कि
जिस्म
मिल
गया
औरत
नहीं
मिली
मुझको
पिता
की
आँख
के
आँसू
तो
मिल
गए
मुझको
पिता
से
ज़ब्त
की
आदत
नहीं
मिली
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Abhishar Geeta Shukla
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भेज
देता
हूँ
मगर
पहले
बता
दूँ
तुझ
को
मुझ
से
मिलता
नहीं
कोई
मिरी
तस्वीर
के
बाद
Umair Najmi
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इक
रोज़
इक
नदी
के
किनारे
मिलेंगे
हम
इक
दूसरे
से
अपना
पता
पूछते
हुए
Shahbaz Rizvi
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इक
नज़र
के
नज़ारे
बहुत
हैं
डूबने
को
किनारे
बहुत
हैं
क्यूँ
करें
ख़ुद-कुशी
बेसबब
हम
आसमाँ
में
सितारे
बहुत
हैं
छोड़
दो
याद
करना
उसे
अब
उस
गली
के
सहारे
बहुत
हैं
हो
गए
ख़ाक़
जल
जल
के
हम
भी
लब
ये
प्यासे
तुम्हारे
बहुत
हैं
छाँव
होती
नहीं
एक
हम
पे
हम
मुक़द्दर
से
हारे
बहुत
हैं
क़त्ल
करना
न
'अंकुर'
हमारा
हम
ही
दुश्मन
हमारे
बहुत
हैं
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Ankur Mishra
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मय-कदों
में
जहाँ
मय-कशी
है
क़तरा
भर
ही
सही
रौशनी
है
जान
जानी
है
जाकर
रहेगी
किसकी
किस
सेे
यहाँ
दोस्ती
है
ख़ामख़ा
नाम
लूँ
क्यूँ
किसी
का
इश्क़
मेरी
तमन्ना
कोई
है
सामने
आ
गए
राज़
सारे
यार
लड़की
वो
पागल
बड़ी
है
माना
'अंकुर'
नहीं
सच
ये
लेकिन
मैं
भी
ख़ुश
हूँ
मुझे
भी
ख़ुशी
है
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Ankur Mishra
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जलता
सुलगता
छोड़ा
था
कुछ
ऐसे
दिल
को
तोड़ा
था
कहने
को
अपना
था
वो
पर
उसने
ही
छाला
फोड़ा
था
मैं
आज
भी
हूँ
वैसा
ही
मुँह
उसने
मुझ
से
मोड़ा
था
कैसे
हो
अब
उस
पे
यक़ीं
दिल
ग़म
से
जिसने
जोड़ा
था
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Ankur Mishra
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अब
कहीं
से
तो
शुरू
ये
सिलसिला
हो
इन
लबों
का
उन
लबों
से
राब्ता
हो
ख़्वाब
टूटे
हैं
कई
सपने
सजाते
बावफ़ा
कैसे
कोई
फिर
आइना
हो
एतिबार-ए-ग़म
मुझे
पहले
से
था
पर
काश
हो
ये
आख़िरी
अंकुर
सदा
हो
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अपनी
कहानी
अपना
इक
किरदार
हो
सर
पे
मिरे
छत
और
इक
दीवार
हो
हर
शाम
मिलने
आए
जुगनू
ऐसे
अब
जैसे
कि
घर
में
कोई
इक
बीमार
हो
कर
लूँगा
मैं
भी
प्यार
इस
सहरा
में
पर
पहले
मिरा
मल्लाह
तो
तैयार
हो
मुझको
यक़ीं
है
उसके
हर
वादे
पे
पर
उस
सेे
कहो
वो
पहले
पेश-ए-यार
हो
कब
तक
यूँँ
हीं
ढूँढे
उसे
दीवानों
सा
वो
भी
कभी
तो
आइने
के
पार
हो
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Ankur Mishra
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