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Ankur Mishra
aadmi aadmi ka khareedaar hai
aadmi aadmi ka khareedaar hai | आदमी आदमी का ख़रीदार है
- Ankur Mishra
आदमी
आदमी
का
ख़रीदार
है
दुनिया
दुनिया
नहीं
एक
बाज़ार
है
बैठे
हैं
हाथ
में
सब
तराज़ू
लिए
कौन
किस
का
यहाँ
पे
मददगार
है
रोज़
उठता
है
साहिब
जनाज़ा
नया
शहर
का
शहर
ही
जैसे
बीमार
है
लब
कोई
खोलता
ही
नहीं
क्या
करें
ज़िंदगी
जान
लेने
को
तैयार
है
दोस्त
है
एक
दुश्मन
सरीखे
मिरा
मुद्दतों
से
बशर
जो
मिरा
यार
है
- Ankur Mishra
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बे-ख़बर
मेरी
तलब
से
है
प्यास
जिस
की
दिल
को
कब
से
है
इन
लकीरों
में
नहीं
शामिल
नाम
होंठों
पे
जो
कब
से
है
एक
मुझ
से
ही
नहीं
वर्ना
राब्ता
'अंकुर'
का
सब
से
है
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ज़ख़्म
जितने
थे
आख़िर
में
भर
ही
गए
दिन
वो
भी
मुफ़्लिसी
के
गुज़र
ही
गए
याद
आता
है
वो
घर
वो
चौखट
मगर
पार
दहलीज़
फिर
भी
वो
कर
ही
गए
ठीक
है
हम
नहीं
दरिया
लेकिन
उसे
आँखों
से
रूह
तक
यार
भर
ही
गए
चोट
गहरी
थी
जो
दे
गया
वो
हमें
यादों
से
फिर
भी
उसकी
उभर
ही
गए
बनते
बनते
तमाशा
मोहब्बत
में
हम
एक
दिन
बाहों
में
उसकी
मर
ही
गए
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एक
क़तरा
भी
तुझको
मुयस्सर
नहीं
आसमाँ
पे
अगर
तेरा
जो
घर
नहीं
ख़ामखा
ज़िंदगी
ज़िंदगी
करता
है
क्या
तुझे
मौत
का
कोई
अब
डर
नहीं
उम्र
भर
ख़त्म
होती
नहीं
दौड़
ये
तूने
शायद
कभी
देखा
अंबर
नहीं
छोड़
दे
अब
तो
तिल
तिल
तू
मरना
यहाँ
अब
तो
तुझको
किसी
का
कोई
डर
नहीं
जान
जानी
है
तो
जाएगी
ही
बशर
जो
बना
तू
अगर
तेरा
सरवर
नहीं
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मिल
के
किस
सेे
हवा
आ
रही
है
खिड़कियों
से
सदा
आ
रही
है
बंद
है
एक
मुद्दत
से
लेकिन
उस
मकाँ
से
दु'आ
आ
रही
है
छोड़
देते
मगर
क्या
करें
हम
मय-कदों
से
सदा
आ
रही
है
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कब
कहा
चाँद
तारों
सा
मैं
मुतमइन
हूँ
किनारों
सा
मैं
राब्ता
खिड़कियों
से
किया
तब
दिखा
फिर
दरारों
सा
मैं
दे
रहीं
थीं
सदाएँ
फ़ज़ा
उड़
रहा
था
ग़ुबारों
सा
मैं
बेसबब
लग
रहा
था
गले
ख़ुद
से
ही
बेसहारों
सा
मैं
टूट
जाऊँ
न
शाखों
से
फिर
बे-तकल्लुफ़
चनारों
सा
मैं
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