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Ankur Mishra
mil ke kis se hawa aa rahi hai
mil ke kis se hawa aa rahi hai | मिल के किस सेे हवा आ रही है
- Ankur Mishra
मिल
के
किस
सेे
हवा
आ
रही
है
खिड़कियों
से
सदा
आ
रही
है
बंद
है
एक
मुद्दत
से
लेकिन
उस
मकाँ
से
दु'आ
आ
रही
है
छोड़
देते
मगर
क्या
करें
हम
मय-कदों
से
सदा
आ
रही
है
- Ankur Mishra
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अपनी
आदत
के
मुताबिक़
चल
रहें
हैं
आज
भी
हम
पहले
सा
ही
जल
रहें
हैं
आँखों
में
अब
तक
वही
सूरत
बसी
है
लगता
है
हम
जैसे
ख़ुद
को
छल
रहें
हैं
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Ankur Mishra
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वो
ज़मीं
आसमाँ
वो
सहर
फिर
ढूँढता
हूँ
वो
अहल-ए-नज़र
फिर
राज़
से
राज़
गहरा
हुआ
जब
याद
आए
मुझे
वो
अधर
फिर
मर
गई
ख़्वाहिशें
भर
गया
दिल
जी
उठी
इक
तमन्ना
मगर
फिर
इसलिए
याद
रखता
हूँ
उसको
याद
आए
न
उसकी
बशर
फिर
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Ankur Mishra
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मय-कदों
में
जहाँ
मय-कशी
है
क़तरा
भर
ही
सही
रौशनी
है
जान
जानी
है
जाकर
रहेगी
किसकी
किस
सेे
यहाँ
दोस्ती
है
ख़ामख़ा
नाम
लूँ
क्यूँ
किसी
का
इश्क़
मेरी
तमन्ना
कोई
है
सामने
आ
गए
राज़
सारे
यार
लड़की
वो
पागल
बड़ी
है
माना
'अंकुर'
नहीं
सच
ये
लेकिन
मैं
भी
ख़ुश
हूँ
मुझे
भी
ख़ुशी
है
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Ankur Mishra
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छोटी
छोटी
मुलाक़ातों
में
है
बस
मज़ा
मिलने
का
रातों
में
है
जल
उठे
हैं
दिए
यादों
के
फिर
आग
ही
इतनी
बरसातों
में
है
उतरे
कैसे
नशा
इश्क़
का
अब
ख़ामुशी
इतनी
जब
बातों
में
है
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Ankur Mishra
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ख़ाली
पैमाना
कब
भरना
था
दर्द
मेरा
किसे
हरना
था
ख़ामख़ा
यादें
वो
दी
लुटा
साथ
मेरे
किसे
मरना
था
सबने
चाहा
यहाँ
जिस्म
बस
इश्क़
किसको
यहाँ
करना
था
क्यूँ
करें
हम
यक़ीं
ख़ुद
पे
भी
हमको
भी
जब
दग़ा
करना
था
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Ankur Mishra
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