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Ankur Mishra
apni aadat ke mutaabiq chal rahen hain
apni aadat ke mutaabiq chal rahen hain | अपनी आदत के मुताबिक़ चल रहें हैं
- Ankur Mishra
अपनी
आदत
के
मुताबिक़
चल
रहें
हैं
आज
भी
हम
पहले
सा
ही
जल
रहें
हैं
आँखों
में
अब
तक
वही
सूरत
बसी
है
लगता
है
हम
जैसे
ख़ुद
को
छल
रहें
हैं
- Ankur Mishra
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एक
आदत
सी
बन
गई
है
तू
और
आदत
कभी
नहीं
जाती
Dushyant Kumar
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एक
मुझे
ख़्वाब
देखने
के
सिवा
चाय
पीने
की
गंदी
आदत
है
Balmohan Pandey
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दुख
तो
बहुत
मिले
हैं
मोहब्बत
नहीं
मिली
यानी
कि
जिस्म
मिल
गया
औरत
नहीं
मिली
मुझको
पिता
की
आँख
के
आँसू
तो
मिल
गए
मुझको
पिता
से
ज़ब्त
की
आदत
नहीं
मिली
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Abhishar Geeta Shukla
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मैं
जिसे
प्यार
का
अंदाज़
समझ
बैठा
हूँ
वो
तबस्सुम
वो
तकल्लुम
तिरी
आदत
ही
न
हो
Sahir Ludhianvi
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ज़ालिम
था
वो
और
ज़ुल्म
की
आदत
भी
बहुत
थी
मजबूर
थे
हम
उस
से
मोहब्बत
भी
बहुत
थी
Kaleem Aajiz
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आदत
सी
बना
ली
है
तुमने
तो
'मुनीर'
अपनी
जिस
शहर
में
भी
रहना
उकताए
हुए
रहना
Muneer Niyazi
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जाने
कैसे
ख़ुश
रहने
की
आदत
डाली
जाती
है
उनके
यहाँ
तो
बारिश
में
भी
धूप
निकाली
जाती
है
Ritesh Rajwada
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एक
उसको
ही
पता
थी
मेरी
आदत
वो
नहीं
हँसता
था
मेरे
कहकहे
पर
Siddharth Saaz
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कितना
भी
दर्द
पिला
दे
ख़ुदा
पी
सकता
हूँ
ज़िन्दगी
हिज्र
से
भर
दे
मिरी
जी
सकता
हूँ
हर
दफ़ा
दिल
पे
ही
खा
के
हुई
है
आदत
ये
बंद
आँखों
से
भी
हर
ज़ख़्म
को
सी
सकता
हूँ
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Faiz Ahmad
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मुझे
मायूस
भी
करती
नहीं
है
यही
आदत
तिरी
अच्छी
नहीं
है
Javed Akhtar
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राब्ता
जब
हुआ
उस
बदन
से
जल
उठा
जिस्म
बू-ए-चमन
से
ख़ाक
करते
मोहब्बत
वो
साहिब
बे-ख़बर
हैं
जो
अहल-ए-वतन
से
आँख
रहती
है
नम
इसलिए
भी
दर्द
वाक़िफ़
है
उल्फ़त
के
फ़न
से
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Ankur Mishra
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हक़
है
तेरा
तू
जताया
कर
शौक़
से
दिल
ये
दुखाया
कर
मुझको
आदत
है
बहकने
की
यूँँ
न
मुझको
आज़माया
कर
है
ठिकाना
मेरा
दिल
तेरा
दूर
मुझ
सेे
यूँँ
न
जाया
कर
उम्र
भर
का
वा'दा
है
अपना
हाथ
सजदे
में
उठाया
कर
मान
बैठा
है
ख़ुदा
जिसको
राज़
उसको
तो
बताया
कर
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Ankur Mishra
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बर्फ़
पलकों
पे
जो
ये
जमी
रह
गई
देर
तक
कोई
खिड़की
खुली
रह
गई
भूल
जाता
हूँ
हर
शाम
मैं
ख़ुद
को
ही
दूर
मुझ
सेे
कहीं
रौशनी
रह
गई
हार
कर
लौट
आया
हूँ
अपना
मैं
सब
मुठ्ठी
में
बस
ये
इक
ज़िंदगी
रह
गई
ज़ख़्म
खाकर
भी
इतने
ख़ुदा
जाने
क्यूँ
होंठों
पे
मेरे
कैसे
हँसी
रह
गई
अब
सुनाऊँ
किसे
क़िस्सा
बर्बादी
का
वो
नज़र
जो
झुकी
थी
झुकी
रह
गई
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Ankur Mishra
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मोहब्बत
की
चाहे
सज़ा
दो
कहीं
मर
न
जाऊँ
दु'आ
दो
मुझे
याद
आती
हैं
यादें
वो
तस्वीर
उसकी
हटा
दो
ये
रस्म-ए-मोहब्बत
अजब
है
वो
कर
ले
किनारा
बता
दो
मिरे
बस
में
भी
कुछ
कहाँ
है
पता
उसको
मेरा
बता
दो
मिरी
शा
में
हैं
तन्हा
'अंकुर'
नशा
कोई
मुझको
लगा
दो
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Ankur Mishra
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ख़ुद
से
वहशत
सी
होने
लगी
है
नींद
रातों
की
खोने
लगी
है
कैसे
जाऊँ
मैं
अब
पास
उसके
उस
से
उल्फ़त
सी
होने
लगी
है
छोड़
आया
था
जो
आँखें
मैं
वो
ख़्वाब
चौखट
पे
बोने
लगी
है
कैसे
देखूँ
मैं
अब
आइना
वो
ख़ामुशी
जिस
में
सोने
लगी
है
है
वो
मुझ
में
ही
अब
भी
कहीं
सच
यादें
जिसकी
ये
रोने
लगी
है
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Ankur Mishra
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