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Ankur Mishra
vo zameen aasmaañ vo sehar phir
vo zameen aasmaañ vo sehar phir | वो ज़मीं आसमाँ वो सहर फिर
- Ankur Mishra
वो
ज़मीं
आसमाँ
वो
सहर
फिर
ढूँढता
हूँ
वो
अहल-ए-नज़र
फिर
राज़
से
राज़
गहरा
हुआ
जब
याद
आए
मुझे
वो
अधर
फिर
मर
गई
ख़्वाहिशें
भर
गया
दिल
जी
उठी
इक
तमन्ना
मगर
फिर
इसलिए
याद
रखता
हूँ
उसको
याद
आए
न
उसकी
बशर
फिर
- Ankur Mishra
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मुश्किलें
थी
बहुत
राहों
में
मुझको
जलना
पड़ा
छाँव
में
पार
कर
लेता
सहरा
मैं
भी
छाला
होता
न
जो
पाँव
में
एक
अरसे
से
हूँ
तन्हा
मैं
पर
वो
आया
न
इन
बाहों
में
हो
यक़ीं
कैसे
अब
उसपे
फिर
ठहरा
ही
जो
नहीं
गाँव
में
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तुम
भी
हम
सेे
सवाल
करते
हो
यार
तुम
भी
कमाल
करते
हो
छीन
कर
ख़्वाब
मेरी
आँखों
से
आँखें
क्यूँ
अपनी
लाल
करते
हो
कट
गई
हिज्र
में
हमारी
भी
किसलिए
अब
मलाल
करते
हो
चूम
लेता
हूँ
हर
वो
शय
मैं
अब
जिस
तरफ़
अपना
गाल
करते
हो
आज
भी
है
ख़याल
उसका
ही
जिसका
अंकुर
ख़याल
करते
हो
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अब
किसी
शय
से
बहलने
वाला
नहीं
आइने
ये
मुस्कुराने
वाला
नहीं
छोड़
दो
ज़िद
आसमाँ
की
अब
आसमाँ
प्यास
प्यासों
की
बुझाने
वाला
नहीं
हो
मुयस्सर
ये
ज़मीं
पैरों
को
तिरे
है
दु'आ
लेकिन
ये
होने
वाला
नहीं
ढूँढते
हो
बेसबब
'अंकुर'
दर-ब-दर
कोई
अब
रोने
रुलाने
वाला
नहीं
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छोटी
छोटी
मुलाक़ातों
में
है
बस
मज़ा
मिलने
का
रातों
में
है
जल
उठे
हैं
दिए
यादों
के
फिर
आग
ही
इतनी
बरसातों
में
है
उतरे
कैसे
नशा
इश्क़
का
अब
ख़ामुशी
इतनी
जब
बातों
में
है
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ख़्वाब
आँखों
को
मेरे
गवारा
नहीं
इसलिए
एक
क़तरा
भी
ख़ारा
नहीं
दूर
तक
है
सनम
ख़्वाहिशों
का
जहाॅं
ये
ज़मीं
आसमाॅं
का
किनारा
नहीं
जल
उठे
हैं
तिरी
धूप
से
ज़िंदगी
वो
दिए
कोई
जिनका
सहारा
नहीं
क़त्ल
होना
है
फ़ितरत
में
उसकी
बशर
दोष
इस
में
ज़रा
भी
हमारा
नहीं
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