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Ankur Mishra
KHvaab aankhoñ ko mere gawara nahin
KHvaab aankhoñ ko mere gawara nahin | ख़्वाब आँखों को मेरे गवारा नहीं
- Ankur Mishra
ख़्वाब
आँखों
को
मेरे
गवारा
नहीं
इसलिए
एक
क़तरा
भी
ख़ारा
नहीं
दूर
तक
है
सनम
ख़्वाहिशों
का
जहाॅं
ये
ज़मीं
आसमाॅं
का
किनारा
नहीं
जल
उठे
हैं
तिरी
धूप
से
ज़िंदगी
वो
दिए
कोई
जिनका
सहारा
नहीं
क़त्ल
होना
है
फ़ितरत
में
उसकी
बशर
दोष
इस
में
ज़रा
भी
हमारा
नहीं
- Ankur Mishra
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जिस
तरह
इन
गुलों
को
सुकूँ
चाहिए
दिल
को
मेरे
वो
दश्त-ए-जुनूँ
चाहिए
याद
रखता
हूँ
यादें
मैं
सारी
मगर
एक
क़िस्सा
मुझे
पुर-फ़ुसूँ
चाहिए
काट
लेंगे
इसे
मान
कर
हिज्र
हम
ज़िंदगी
पर
वो
जोश-ए-जुनूँ
चाहिए
बेसबब
लग
गई
है
ये
आदत
मुझे
पर
तुम्हें
अश्क
'अंकुर'
ये
क्यूँँ
चाहिए
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Ankur Mishra
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हम
भी
तेरी
तरह
काश
में
रह
गए
भीगते
नैन
गुल-पाश
में
रह
गए
शौक़
था
ज़िंदगी
का
हमें
इसलिए
क़ैद
होकर
इसी
लाश
में
रह
गए
बढ़
चुकी
थी
तलब
इस
क़दर
हम-नशीं
लफ़्ज़-दर-लफ़्ज़
हम
फ़ाश
में
रह
गए
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Ankur Mishra
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मौसम
बदल
ही
जाते
हैं
जुगनू
निकल
ही
आते
हैं
बस
में
किसी
के
कुछ
नहीं
आख़िर
में
मर
ही
जाते
हैं
मैं
कैसे
छोड़ूँ
वो
गली
ये
रास्ते
अब
भाते
हैं
जब
से
है
देखा
चाँद
वो
तब
से
कहाँ
सो
पाते
हैं
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Ankur Mishra
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बे-ख़बर
मेरी
तलब
से
है
प्यास
जिस
की
दिल
को
कब
से
है
इन
लकीरों
में
नहीं
शामिल
नाम
होंठों
पे
जो
कब
से
है
एक
मुझ
से
ही
नहीं
वर्ना
राब्ता
'अंकुर'
का
सब
से
है
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Ankur Mishra
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कितनी
उल्फ़त
थी
कितनी
वफ़ा
है
अब
भी
तेरा
वही
रास्ता
है
ढूँढता
है
किसे
दर-ब-दर
तू
कैसा
ये
दर्द
कैसी
दवा
है
उम्र
भर
मैं
रहा
साथ
जिसके
साया
वो
अब
कहीं
लापता
है
है
यक़ीं
अब
भी
मुझपे
उसे
पर
शख़्स
वो
यार
पागल
बड़ा
है
लौटा
है
जब
से
वो
उस
गली
से
जान
देने
पे
'अंकुर'
अड़ा
है
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Ankur Mishra
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