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Ankur Mishra
mausam badal hi jaate hain
mausam badal hi jaate hain | मौसम बदल ही जाते हैं
- Ankur Mishra
मौसम
बदल
ही
जाते
हैं
जुगनू
निकल
ही
आते
हैं
बस
में
किसी
के
कुछ
नहीं
आख़िर
में
मर
ही
जाते
हैं
मैं
कैसे
छोड़ूँ
वो
गली
ये
रास्ते
अब
भाते
हैं
जब
से
है
देखा
चाँद
वो
तब
से
कहाँ
सो
पाते
हैं
- Ankur Mishra
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काश
जन्नत
हमें
मिले
ऐसी
हर
तरफ़
आशिक़ाना
मौसम
हो
Amaan Pathan
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आप
जो
ठीक
समझते
हैं
वो
करिए
साहब
ऐसे
मौसम
में
मैं
दफ़्तर
तो
नहीं
आ
सकता
Vashu Pandey
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होली
है
या
फिर
फूलों
का
मौसम
है
सब
के
चेहरों
पे
रंग
है
ख़ुशबू
भी
है
Meem Alif Shaz
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ज़रा
मौसम
तो
बदला
है
मगर
पेड़ों
की
शाख़ों
पर
नए
पत्तों
के
आने
में
अभी
कुछ
दिन
लगेंगे
बहुत
से
ज़र्द
चेहरों
पर
ग़ुबार-ए-ग़म
है
कम
बे-शक
पर
उन
को
मुस्कुराने
में
अभी
कुछ
दिन
लगेंगे
Javed Akhtar
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ख़ुद
बुलाओ
के
वो
यूँँ
घर
से
नहीं
निकलेगा
यहाँ
इनाम
मुक़द्दर
से
नहीं
निकलेगा
ऐसे
मौसम
में
बिना
काम
के
आया
हुआ
शख़्स
इतनी
जल्दी
तेरे
दफ़्तर
से
नहीं
निकलेगा
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Khurram Afaq
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ग़ुंचा
ओ
गुल
माह
ओ
अंजुम
सब
के
सब
बेकार
थे
आप
क्या
आए
कि
फिर
मौसम
सुहाना
आ
गया
Asad Bhopali
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तुम्हारे
शहर
का
मौसम
बड़ा
सुहाना
लगे
मैं
एक
शाम
चुरा
लूँ
अगर
बुरा
न
लगे
Qaisar-ul-Jafri
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बदल
गए
मेरे
मौसम
तो
यार
अब
आए
ग़मों
ने
चाट
लिया
ग़म-गुसार
अब
आए
Farhat Abbas Shah
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बदले
मौसम
हालात
यहाँ
है
ख़ुशियों
की
बारात
यहाँ
होली
खेलेंगे
हम
भी
पर
खेलेंगे
तेरे
साथ
यहाँ
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Kaviraj " Madhukar"
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तेरी
यादों
की
धूप
आने
लगी
है
अभी
खुल
जाएगा
मौसम
हमारा
Subhan Asad
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एक
दिन
यूँँ
हीं
गुज़र
जाएँगे
छोड़
के
यादों
को
मर
जाएँगे
Ankur Mishra
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किस
से
हाल-ए-दिल
ये
कहते
बाद
उसके
कैसे
रहते
मर
गया
जब
मुझ
में
मैं
ही
अश्क
ये
फिर
कैसे
बहते
कर
लिया
फिर
ख़ुद
को
पत्थर
ज़ख़्म
कितने
और
सहते
बरसों
से
हैं
तन्हा
'अंकुर'
कैसे
बिन
अब
ख़ुद
के
रहते
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Ankur Mishra
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अपनी
अना
में
चूर
हूँ
ख़ुद
के
लिए
नासूर
हूँ
करता
हूँ
जो
दिल
कहता
है
हाँ
सच
है
मैं
मग़रूर
हूँ
जिसको
है
जाना
जाए
वो
मुझको
मैं
तो
मंज़ूर
हूँ
माना
है
वो
मंज़िल
मेरी
उस
सेे
मगर
मैं
दूर
हूँ
आँखें
भरी
हैं
ख़्वाबों
से
लेकिन
मैं
अब
बे-नूर
हूँ
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Ankur Mishra
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अजब
हम
भी
तलब
रखने
लगे
हैं
खुली
आँखों
में
सब
रखने
लगे
हैं
किनारा
कर
लिया
अश्कों
से
लेकिन
हाँ
सहरा
सा
अदब
रखने
लगे
हैं
चराग़ों
के
लिए
ये
रौशनी
क्यूँ
वो
अंकुर
बेसबब
रखने
लगे
हैं
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Ankur Mishra
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इस
क़दर
डरते
हैं
अपनी
हार
से
जुड़
नहीं
पाते
किसी
किरदार
से
है
भरोसा
ज़िंदगी
तुझपे
मगर
लोग
वाक़िफ़
हैं
तिरे
मेयार
से
देखकर
जलते
चराग़ों
को
मुझे
रब्त
सा
होता
है
पहरे-दार
से
इसलिए
शायद
कोई
लड़ता
नहीं
जीत
मुश्किल
है
दिल-ए-बीमार
से
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Ankur Mishra
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