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Subhan Asad
teri yaadon ki dhoop aane lagii hai
teri yaadon ki dhoop aane lagii hai | तेरी यादों की धूप आने लगी है
- Subhan Asad
तेरी
यादों
की
धूप
आने
लगी
है
अभी
खुल
जाएगा
मौसम
हमारा
- Subhan Asad
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मैं
आख़िर
कौन
सा
मौसम
तुम्हारे
नाम
कर
देता
यहाँ
हर
एक
मौसम
को
गुज़र
जाने
की
जल्दी
थी
Rahat Indori
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शब
बसर
करनी
है,
महफ़ूज़
ठिकाना
है
कोई
कोई
जंगल
है
यहाँ
पास
में
?
सहरा
है
कोई
?
Umair Najmi
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हो
गई
है
पीर
पर्वत
सी
पिघलनी
चाहिए
इस
हिमालय
से
कोई
गंगा
निकलनी
चाहिए
Dushyant Kumar
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हमें
इस
मिट्टी
से
कुछ
यूँँ
मुहब्बत
है
यहीं
पे
निकले
दम
दिल
की
ये
हसरत
है
हमें
क्यूँ
चाह
उस
दुनिया
की
हो
मौला
हमारी
तो
इसी
मिट्टी
में
जन्नत
है
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Harsh saxena
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चाँद
चेहरा
ज़ुल्फ़
दरिया
बात
ख़ुशबू
दिल
चमन
इक
तुम्हें
दे
कर
ख़ुदा
ने
दे
दिया
क्या
क्या
मुझे
Bashir Badr
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मुझ
पर
निगाह-ए-नाज़
का
जब
जादू
चल
गया
मैं
रफ़्ता
रफ़्ता
क़ैस
की
सोहबत
में
ढल
गया
ज़ुल्फें
उन्होंने
खोल
के
बिखराई
थी
शजर
फिर
देखते
ही
देखते
मौसम
बदल
गया
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Shajar Abbas
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पत्थर
दिल
के
आँसू
ऐसे
बहते
हैं
जैसे
इक
पर्वत
से
नदी
निकलती
है
Shobhit Dixit
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रात
के
जिस्म
में
जब
पहला
पियाला
उतरा
दूर
दरिया
में
मेरे
चाँद
का
हाला
उतरा
Kumar Vishwas
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मुहब्बत
आपसे
करना
कभी
आसाँ
नहीं
था
पर
बिना
कश्ती
के
दरिया
पार
करना
शौक़
है
मेरा
Tanoj Dadhich
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ख़ुद
बुलाओ
के
वो
यूँँ
घर
से
नहीं
निकलेगा
यहाँ
इनाम
मुक़द्दर
से
नहीं
निकलेगा
ऐसे
मौसम
में
बिना
काम
के
आया
हुआ
शख़्स
इतनी
जल्दी
तेरे
दफ़्तर
से
नहीं
निकलेगा
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Khurram Afaq
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और
किस
शय
से
दाग़-ए-दिल
धोएँ
क्या
करें
गर
न
इस
क़दर
रोएँ
दिल
तो
पत्थर
बना
दिया
तू
ने
आरज़ू
किस
ज़मीन
में
बोएँ
हम
किसी
बात
से
नहीं
डरते
हम
ने
पाया
ही
क्या
है
जो
खोएँ
आज
फ़ुर्सत
मिली
हैं
मुद्दत
बअ'द
आओ!
तंगी-ए-वक़्त
पर
रोएँ
हम
यही
ख़्वाब
देखते
हैं
'असद'
उन
के
शाने
पे
रख
के
सर
सोएँ
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Subhan Asad
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ये
कांटे,
ये
धूप,
ये
पत्थर
इनसे
कैसा
डरना
है
राहें
मुश्किल
हो
जाएँ
तो
छोड़ी
थोड़ी
जाती
हैं
Subhan Asad
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मेरी
नींदें
उड़ा
रक्खी
है
तुम
ने
ये
कैसे
ख़्वाब
दिखलाती
हो
जानाँ
किसी
दिन
देखना
मर
जाऊँगा
मैं
मेरी
क़स
में
बहुत
खाती
हो
जानाँ
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Subhan Asad
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इस
तरह
से
तर्जुमानी
कर
गया
मेरे
अश्कों
को
वो
पानी
कर
गया
उस
ने
चेहरे
से
हटा
डाला
नक़ाब
और
मेरी
ग़ज़लें
पुरानी
कर
गया
रख
गया
वो
अपने
कपड़े
सूखने
धूप
भी
कितनी
सुहानी
कर
गया
भूल
जाने
की
क़सम
देना
तेरा
याद
आने
की
निशानी
कर
गया
दो
घड़ी
को
पास
आया
था
कोई
दिल
पे
बरसों
हुक्मरानी
कर
गया
जिस
पे
मैं
ईमान
ले
आया
'असद'
मुझ
से
वो
ही
बे-ईमानी
कर
गया
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Subhan Asad
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जब
भी
उस
कूचे
में
जाना
पड़ता
है
ज़ख़्मों
पर
तेज़ाब
लगाना
पड़ता
है
उसके
घर
से
दूर
नहीं
है
मेरा
घर
रस्ते
में
पर
एक
ज़माना
पड़ता
है
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Subhan Asad
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