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Harsh saxena
ha
ha | हमें इस मिट्टी से कुछ यूँँ मुहब्बत है
- Harsh saxena
हमें
इस
मिट्टी
से
कुछ
यूँँ
मुहब्बत
है
यहीं
पे
निकले
दम
दिल
की
ये
हसरत
है
हमें
क्यूँ
चाह
उस
दुनिया
की
हो
मौला
हमारी
तो
इसी
मिट्टी
में
जन्नत
है
- Harsh saxena
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उम्र-भर
के
सज्दों
से
मिल
नहीं
सकी
जन्नत
ख़ुल्द
से
निकलने
को
इक
गुनाह
काफ़ी
है
Ambreen Haseeb Ambar
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नए
साल
में
पिछली
नफ़रत
भुला
दें
चलो
अपनी
दुनिया
को
जन्नत
बना
दें
Unknown
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झुके
तो
जन्नत
उठे
तो
ख़ंजर
करेंगी
हम
को
तबाह
आँखें
Parul Singh "Noor"
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फ़र्त-ए-ख़ुशी
से
अपनी
जो
भी
रश्क
करते
हैं
उनको
तिरी
बनाई
वो
जन्नत
तलब
नहीं
Sabir Hussain
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हमेशा
साथ
सबके
तो
ख़ुदा
भी
रह
नहीं
सकता
बनाकर
औरतें
उसने
ज़मीं
को
यूँँ
किया
जन्नत
Anukriti 'Tabassum'
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हम
को
मालूम
है
जन्नत
की
हक़ीक़त
लेकिन
दिल
के
ख़ुश
रखने
को
'ग़ालिब'
ये
ख़याल
अच्छा
है
Mirza Ghalib
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नहीं
हर
चंद
किसी
गुम-शुदा
जन्नत
की
तलाश
इक
न
इक
ख़ुल्द-ए-तरब-नाक
का
अरमाँ
है
ज़रूर
बज़्म-ए-दोशंबा
की
हसरत
तो
नहीं
है
मुझ
को
मेरी
नज़रों
में
कोई
और
शबिस्ताँ
है
ज़रूर
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Asrar Ul Haq Majaz
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हम
आसमाँ
के
लोग
थे
जन्नत
से
आए
थे
ख़ुद
को
मगर
ज़मीं
में
बोना
पड़ा
हमें
Abbas Qamar
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मैं
सालों
बाद
जब
भी
गाँव
जाता
हूँ
लिए
पीपल
की
ठंडी
छाँव
जाता
हूँ
कहीं
मैली
न
हो
जाए
ये
जन्नत
मैं
माँ
के
पास
नंगे
पाँव
जाता
हूँ
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Ashok Sagar
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मिरे
माँ
बाप
जन्नत
से
नज़र
रखते
हैं
मुझ
पर
अब
मिरे
दिल
में
यतीमों
के
लिए
इक
ख़ास
कोना
है
Amaan Pathan
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बदन
उतार
के
खूँटी
पे
टाँग
आया
हूँ
तुम्हारा
फ़र्ज़
है
मुझको
गले
लगाने
का
Harsh saxena
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जिसे
जो
जी
में
आता
है
सो
लिखता
है
बड़ा
मुश्किल
है
कह
पाना
क़लम
का
दुख
Harsh saxena
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तुम
भला
उस
प्रेम
की
गहराई
क्या
समझोगे
जानाँ
जो
कभी
ख़्वाबों
में
भी
अपनी
न
सरहद
लाँघता
है
Harsh saxena
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कुछ
इस
सलीक़े
से
माथे
पे
उसने
होंट
रखे
बदन
को
छोड़
के
सारी
थकन
को
चूम
लिया
Harsh saxena
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जाड़ों
की
रातें
उस
पर
भी
तुम
सेे
ये
जुदाई
बाहों
की
छोड़ो
हमको
हासिल
नहीं
रजाई
Harsh saxena
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