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Ankur Mishra
bekhbar meri talab se hai
bekhbar meri talab se hai | बे-ख़बर मेरी तलब से है
- Ankur Mishra
बे-ख़बर
मेरी
तलब
से
है
प्यास
जिस
की
दिल
को
कब
से
है
इन
लकीरों
में
नहीं
शामिल
नाम
होंठों
पे
जो
कब
से
है
एक
मुझ
से
ही
नहीं
वर्ना
राब्ता
'अंकुर'
का
सब
से
है
- Ankur Mishra
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जिस्म
जलने
लगा
है
तिरी
तिश्नगी
से
सनम
प्यास
बुझती
नहीं
क्यूँ
मिरी
मय-कशी
से
सनम
एक
अर्सा
हुआ
क्यूँ
तिरी
याद
आई
नहीं
एक
अर्सा
हुआ
बिछड़े
मुझ
को
ख़ुशी
से
सनम
देख
कर
आइना
सोचता
हूँ
मैं
अक्सर
यही
टूट
जाए
न
रिश्ता
कहीं
बे-ख़ुदी
से
सनम
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Ankur Mishra
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घर
से
मंज़िल
का
पता
लेकर
उड़
गए
सब
घोंसला
लेकर
अक्श
आँखों
में
है
ज़िंदा
इक
टूटे
ख़्वाबों
की
सदा
लेकर
बेसबब
फिरते
हैं
दोनों
ही
इक
तमन्ना
जा-ब-जा
लेकर
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Ankur Mishra
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उस
रह-गुज़र
से
फिर
गुज़रने
के
लिए
मरना
पड़ेगा
ज़ख़्म
भरने
के
लिए
ज़िंदा
हूँ
अब
तक
बे-सबब
मैं
ज़िंदगी
सदमा
यही
काफ़ी
है
मरने
के
लिए
इस
तिश्नगी
से
कब
तलक़
लड़ता
सनम
तैयार
था
वो
भी
मुकरने
के
लिए
इक
आइने
से
पूछता
है
आइना
क्या
चाहिए
अंकुर
बिखरने
के
लिए
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Ankur Mishra
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घूम
कर
आना
था
सो
हम
आ
गए
उस
गली
की
ख़ाक
को
हम
भा
गए
सोच
रक्खा
था
रखेंगे
फ़ासला
पर
नज़र
में
ज़ख़्म
जो
थे
आ
गए
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Ankur Mishra
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उसके
लब-ओ-रुख़्सार
से
था
इश्क़
मुझको
प्यार
से
वो
माने
चाहे
अब
न
पर
ख़ुश
हूँ
मैं
अपनी
हार
से
इक
उम्र
तन्हा
गुज़री
है
लड़ते
दर-ओ-दीवार
से
कैसे
कहूँ
उल्फ़त
नहीं
उस
बे-वफ़ा
बेज़ार
से
रो
रो
के
आँखें
कहती
हैं
जल
जाऊँ
इस
अंगार
से
मिलना
नहीं
कुछ
भी
बशर
ख़ाली
पड़े
बाज़ार
से
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Ankur Mishra
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