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Ankur Mishra
ghoom kar aanaa tha so ham aa gayeus gali kii khaak ko ham bha ga.e
ghoom kar aanaa tha so ham aa gayeus gali kii khaak ko ham bha ga.e | घूम कर आना था सो हम आ गए
- Ankur Mishra
घूम
कर
आना
था
सो
हम
आ
गए
उस
गली
की
ख़ाक
को
हम
भा
गए
सोच
रक्खा
था
रखेंगे
फ़ासला
पर
नज़र
में
ज़ख़्म
जो
थे
आ
गए
- Ankur Mishra
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किसी
से
दूरी
बनाई
किसी
के
पास
रहे
हज़ार
कोशिशें
कर
लीं
मगर,
उदास
रहे
Sawan Shukla
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कैसी
बिपता
पाल
रखी
है
क़ुर्बत
की
और
दूरी
की
ख़ुशबू
मार
रही
है
मुझ
को
अपनी
ही
कस्तूरी
की
Naeem Sarmad
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शब-ए-विसाल
बहुत
कम
है
आसमाँ
से
कहो
कि
जोड़
दे
कोई
टुकड़ा
शब-ए-जुदाई
का
Ameer Minai
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जिस
की
आँखों
में
कटी
थीं
सदियाँ
उस
ने
सदियों
की
जुदाई
दी
है
Gulzar
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बता
रहा
है
झटकना
तेरी
कलाई
का
ज़रा
भी
रंज
नहीं
है
तुझे
जुदाई
का
मैं
ज़िंदगी
को
खुले
दिल
से
खर्च
करता
था
हिसाब
देना
पड़ा
मुझको
पाई-पाई
का
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Azhar Faragh
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किस
किस
को
बताएँगे
जुदाई
का
सबब
हम
तू
मुझ
से
ख़फ़ा
है
तो
ज़माने
के
लिए
आ
Ahmad Faraz
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थी
वस्ल
में
भी
फ़िक्र-ए-जुदाई
तमाम
शब
वो
आए
तो
भी
नींद
न
आई
तमाम
शब
Momin Khan Momin
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नज़दीकी
अक्सर
दूरी
का
कारन
भी
बन
जाती
है
सोच-समझ
कर
घुलना-मिलना
अपने
रिश्ते-दारों
में
Aalok Shrivastav
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उस
मेहरबाँ
नज़र
की
इनायत
का
शुक्रिया
तोहफ़ा
दिया
है
ईद
पे
हम
को
जुदाई
का
Unknown
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जो
देखने
में
बहुत
ही
क़रीब
लगता
है
उसी
के
बारे
में
सोचो
तो
फ़ासला
निकले
Waseem Barelvi
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क्या
है
वो
किसको
ख़बर
है
तुमको
अब
ये
किसका
डर
है
होना
था
जो
हो
चुका
वो
ख़ाली
क्यूँ
फिर
अब
ये
घर
है
रात
भर
सोया
नहीं
मैं
जाने
किसका
ये
असर
है
राब्ता
कैसे
हो
ख़ुद
से
सजदे
में
उसके
ये
सर
है
वो
मिले
तो
उस
सेे
पूछूँ
आँख
क्यूँ
मेरी
ये
तर
है
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Ankur Mishra
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एक
तू
और
तेरी
कमी
से
है
अँधेरा
बहुत
रौशनी
से
किस
तरह
कोई
वा'दा
निभाऊँ
जान
जाती
नहीं
ख़ुद-कुशी
से
ज़ुर्म
को
ज़ुर्म
साबित
करे
क्यूँ
क्यूँ
करें
हम
मोहब्बत
तुझी
से
है
लकीरों
में
ही
फ़ासला
जब
किसलिए
दिल-लगी
ज़िंदगी
से
क़त्ल
होना
है
फ़ितरत
में
मेरी
ये
बताना
है
'अंकुर'
किसी
से
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Ankur Mishra
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हमने
रो
के
शब
गुज़ारी
है
यादों
की
इतनी
उधारी
है
कर
लूँ
कैसे
ख़ुद-कुशी
यूँँ
ही
जान
भी
तो
ये
तुम्हारी
है
हक़
है
तुझको
छोड़
जाए
तू
रात
काली
अब
हमारी
है
मुझको
है
मालूम
हर
रस्ता
इश्क़
भी
ये
रोग
भारी
है
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Ankur Mishra
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इतना
क्यूँ
पहरा
रखने
लगे
हो
चेहरे
पर
चेहरा
रखने
लगे
हो
कब
से
देखी
नहीं
शक्ल
वो
अब
राज़
क्या
गहरा
रखने
लगे
हो
मुद्दतों
बाद
तो
आए
हो
तुम
आँखों
में
सहरा
रखने
लगे
हो
इक
ज़माना
हुआ
देखे
तुमको
दर्द
क्यूँ
ठहरा
रखने
लगे
हो
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Ankur Mishra
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राज़-ए-वफ़ा
मैं
खोल
दूँ
तोहफ़ा
कोई
अनमोल
दूँ
मुश्किल
से
तो
माना
है
वो
सच
चाहते
हो
बोल
दूँ
बरसों
रहा
हूँ
प्यासा
मैं
अब
ज़हर
कैसे
घोल
दूँ
मर
जाउॅंगा
बिन
उसके
मैं
सोचा
है
उस
सेे
बोल
दूँ
शायद
सुकूँ
मिल
जाए
फिर
दिल
अपना
जब
ये
मोल
दूँ
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Ankur Mishra
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