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Ankur Mishra
itnaa kyuuñ pahra rakhne lage ho
itnaa kyuuñ pahra rakhne lage ho | इतना क्यूँ पहरा रखने लगे हो
- Ankur Mishra
इतना
क्यूँ
पहरा
रखने
लगे
हो
चेहरे
पर
चेहरा
रखने
लगे
हो
कब
से
देखी
नहीं
शक्ल
वो
अब
राज़
क्या
गहरा
रखने
लगे
हो
मुद्दतों
बाद
तो
आए
हो
तुम
आँखों
में
सहरा
रखने
लगे
हो
इक
ज़माना
हुआ
देखे
तुमको
दर्द
क्यूँ
ठहरा
रखने
लगे
हो
- Ankur Mishra
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जिस
तरह
इन
गुलों
को
सुकूँ
चाहिए
दिल
को
मेरे
वो
दश्त-ए-जुनूँ
चाहिए
याद
रखता
हूँ
यादें
मैं
सारी
मगर
एक
क़िस्सा
मुझे
पुर-फ़ुसूँ
चाहिए
काट
लेंगे
इसे
मान
कर
हिज्र
हम
ज़िंदगी
पर
वो
जोश-ए-जुनूँ
चाहिए
बेसबब
लग
गई
है
ये
आदत
मुझे
पर
तुम्हें
अश्क
'अंकुर'
ये
क्यूँँ
चाहिए
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कैसे
उसको
भूल
पाएँगे
कैसे
ख़ुद
से
हम
निभाएँगे
माना
मुश्किल
है
यूँँ
जीना
पर
याद
वो
हर
दम
ही
आएँगे
खोल
दी
हैं
खिड़कियाँ
मैंने
देर
कितना
वो
लगाएँगे
एक
अरसे
से
हूँ
तन्हा
मैं
और
कितना
वो
सताएँगे
थक
चुकी
हैं
आँखें
मेरी
ये
कितना
मुझको
वो
रुलाएँगे
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बे-ख़बर
मेरी
तलब
से
है
प्यास
जिस
की
दिल
को
कब
से
है
इन
लकीरों
में
नहीं
शामिल
नाम
होंठों
पे
जो
कब
से
है
एक
मुझ
से
ही
नहीं
वर्ना
राब्ता
'अंकुर'
का
सब
से
है
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मेरे
तसव्वुर
से
निकल
जाता
है
क्यूँ
वो
शाम
से
पहले
ही
ढल
जाता
है
क्यूँ
जो
आग
गुज़री
भी
नहीं
छू
कर
कभी
उस
आग
से
ये
जिस्म
जल
जाता
है
क्यूँ
है
टूटना
अंकुर
मुक़द्दर
गर
मिरा
ये
आइना
साँचे
में
ढल
जाता
है
क्यूँ
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दिल
जलाकर
रौशनी
की
है
नाम
उसके
ज़िंदगी
की
है
भूलूँ
कैसे
उसको
मैं
यूँँ
हीं
जिसकी
मैंने
बंदगी
की
है
छोड़
दो
तन्हा
ही
मुझको
तुम
दिल
ने
ख़्वाहिश
आख़िरी
की
है
मुद्दतों
देखा
नहीं
ख़ुद
को
इतनी
मैंने
आशिक़ी
की
है
कैसे
जाऊँ
दूर
उस
सेे
मैं
जिसकी
ख़ातिर
ख़ुद-कुशी
की
है
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