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Ankur Mishra
mere tasavvur se nikal jaata hai kyuuñ
mere tasavvur se nikal jaata hai kyuuñ | मेरे तसव्वुर से निकल जाता है क्यूँ
- Ankur Mishra
मेरे
तसव्वुर
से
निकल
जाता
है
क्यूँ
वो
शाम
से
पहले
ही
ढल
जाता
है
क्यूँ
जो
आग
गुज़री
भी
नहीं
छू
कर
कभी
उस
आग
से
ये
जिस्म
जल
जाता
है
क्यूँ
है
टूटना
अंकुर
मुक़द्दर
गर
मिरा
ये
आइना
साँचे
में
ढल
जाता
है
क्यूँ
- Ankur Mishra
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हुस्न
पे
ये
बहार
रहने
दो
जिस्म
कोरा
ही
यार
रहने
दो
शौक़
है
मय-कशी
का
हमको
भी
हल्का
हल्का
ख़ुमार
रहने
दो
वा'दा
है
वा'दा
मैं
निभाऊँगा
आँखों
को
बेक़रार
रहने
दो
एक
दिन
होना
है
रिहा
सबको
ख़ाली
अंकुर
दयार
रहने
दो
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Ankur Mishra
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जलता
सुलगता
छोड़ा
था
कुछ
ऐसे
दिल
को
तोड़ा
था
कहने
को
अपना
था
वो
पर
उसने
ही
छाला
फोड़ा
था
मैं
आज
भी
हूँ
वैसा
ही
मुँह
उसने
मुझ
से
मोड़ा
था
कैसे
हो
अब
उस
पे
यक़ीं
दिल
ग़म
से
जिसने
जोड़ा
था
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Ankur Mishra
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सौ
बहाने
थे
जब
ख़ुद-कुशी
के
ख़्वाब
देखे
थे
तब
ज़िंदगी
के
इस
तरह
छोड़
कर
ख़ुद
को
कैसे
यार
होते
कभी
हम
किसी
के
ख़्वाब
आँखों
में
तन्हा
हैं
जानाँ
पी
गया
अश्क
कोई
सभी
के
कब
तलक
इस
तरह
हम
किसी
को
ज़ख़्म
'अंकुर'
दिखाएँ
किसी
के
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Ankur Mishra
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चेहरा
बदल
कर
चलता
है
कब
मुझ
में
वो
अब
ढलता
है
अर्सा
हुआ
देखे
उसे
दिल
अब
बहुत
ये
जलता
है
उस
सेे
कहो
आए
चला
तन्हा
यूँँ
रहना
खलता
है
शायद
उसे
हो
ये
ख़बर
पर
दर्द
मुझ
में
पलता
है
छूकर
मुझे
देखो
बशर
ये
जिस्म
कैसे
गलता
है
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Ankur Mishra
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हमेशा
नहीं
थी
डगर
वो
चले
पर
उसी
पे
मगर
वो
कहाँ
है
ख़बर
है
मुझे
पर
नहीं
है
हमारे
सदर
वो
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Ankur Mishra
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