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Ankur Mishra
chehra badal kar chaltaa hai
chehra badal kar chaltaa hai | चेहरा बदल कर चलता है
- Ankur Mishra
चेहरा
बदल
कर
चलता
है
कब
मुझ
में
वो
अब
ढलता
है
अर्सा
हुआ
देखे
उसे
दिल
अब
बहुत
ये
जलता
है
उस
सेे
कहो
आए
चला
तन्हा
यूँँ
रहना
खलता
है
शायद
उसे
हो
ये
ख़बर
पर
दर्द
मुझ
में
पलता
है
छूकर
मुझे
देखो
बशर
ये
जिस्म
कैसे
गलता
है
- Ankur Mishra
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उस
साँवले
से
जिस्म
को
देखा
ही
था
कि
बस
घुलने
लगे
ज़बाँ
पे
मज़े
चाकलेट
के
Shahid Kabir
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हाथ
गुल
से
औ
बदन
में
रातरानी
की
महक
आपको
लड़की
नहीं
इक
बाग़
होना
चाहिए
Ashish Awasthi
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अब
सुलगती
है
हथेली
तो
ख़याल
आता
है
वो
बदन
सिर्फ़
निहारा
भी
तो
जा
सकता
था
Ameer Imam
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तुमने
कैसे
उसके
जिस्म
की
ख़ुशबू
से
इनकार
किया
उस
पर
पानी
फेंक
के
देखो
कच्ची
मिट्टी
जैसा
है
Tehzeeb Hafi
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जिस्म
चादर
सा
बिछ
गया
होगा
रूह
सिलवट
हटा
रही
होगी
Kumar Vishwas
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हलाल
रिज़्क़
का
मतलब
किसान
से
पूछो
पसीना
बन
के
बदन
से
लहू
निकलता
है
Aadil Rasheed
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सख़्त
सर्दी
में
ठिठुरती
है
बहुत
रूह
मिरी
जिस्म-ए-यार
आ
कि
बेचारी
को
सहारा
मिल
जाए
Farhat Ehsaas
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चिलचिलाती
धूप
है
और
पैर
में
चप्पल
नहीं
जिस्म
घाइल
है
मगर
ये
हौसला
घाइल
नहीं
Tanoj Dadhich
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कभी
मिलता
नहीं
क्यूँ
मुझ
को
मुझ
में
कहाँ
है
गर
मेरे
अंदर
ख़ुदा
है
भटकती
है
कहीं
और
ही
मेरी
रूह
बदन
मेरा
कहीं
और
ही
पड़ा
है
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Chandan Sharma
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ये
गहरा
राज़
है
इसका
बदन
को
खा
ही
जाती
है
मोहब्बत
पाक
होकर
भी
हवस
तक
आ
ही
जाती
है
ALI ZUHRI
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मौसम
बदल
ही
जाते
हैं
जुगनू
निकल
ही
आते
हैं
बस
में
किसी
के
कुछ
नहीं
आख़िर
में
मर
ही
जाते
हैं
मैं
कैसे
छोड़ूँ
वो
गली
ये
रास्ते
अब
भाते
हैं
जब
से
है
देखा
चाँद
वो
तब
से
कहाँ
सो
पाते
हैं
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Ankur Mishra
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अब
वो
भी
आज़माने
लगा
है
नाम
ले
कर
बुलाने
लगा
है
उम्र
भर
साथ
चलना
कहा
था
वो
तो
नज़दीक
आने
लगा
है
रोज़
खाता
था
क़स
में
वफ़ा
की
आज
करवट
बदलने
लगा
है
पार
कैसे
हो
दरिया
ये
जानाँ
अक्स
उसका
उभरने
लगा
है
फ़ासले
बे-सबब
ही
नहीं
ये
फ़ासला
वो
बनाने
लगा
है
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Ankur Mishra
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हादसा
बन
गुज़र
जाने
को
ज़िंदा
हैं
हम
भी
मर
जाने
को
आए
कैसे
कोई
ख़्वाब
जब
रातें
कहती
हैं
डर
जाने
को
थक
गया
हूँ
मैं
ख़ुद
से
भी
अब
हो
रही
देर
घर
जाने
को
छोड़
दो
प्यासा
ही
मुझको
तुम
पार
दरिया
ये
कर
जाने
को
लौटना
फिर
नहीं
मुझको
अब
इश्क़
में
यूँँ
ही
मर
जाने
को
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Ankur Mishra
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रात
कट
जाएगी
दिन
गुज़र
जाएगा
चोट
कैसी
भी
हो
ज़ख़्म
भर
जाएगा
उड़
गया
तोड़
कर
डोर
जो
साँसों
की
एक
दिन
वो
परिंदा
भी
मर
जाएगा
मान
लेता
हूँ
मेरा
नहीं
वो
मगर
दाग़
दामन
पे
लेकर
किधर
जाएगा
ख़ामख़ाँ
कर
दिया
मैंने
ख़ुद
को
फ़ना
वो
किनारे
से
पहले
उतर
जाएगा
ज़िंदगी
ले
रही
है
अभी
इम्तिहाँ
आँख
से
डर
है
काजल
बिखर
जाएगा
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Ankur Mishra
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जलना
ही
अपना
मुक़द्दर
है
कोरा
काग़ज़
धुँधला
अक्षर
है
हो
यक़ीं
कैसे
किसी
पे
अब
चंद
वादें
और
बिस्तर
है
क्या
लिखूँ
मैं
इस
सेे
आगे
अब
जेब
ख़ाली
जिस्म
बंजर
है
मुद्दतों
पूछा
नहीं
उसने
गहरा
कितना
ये
समुंदर
है
डूबना
तय
था
मिरा
अंकुर
एक
सहरा
मेरे
अंदर
है
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Ankur Mishra
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