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Ankur Mishra
husn pe ye bahaar rahne do
husn pe ye bahaar rahne do | हुस्न पे ये बहार रहने दो
- Ankur Mishra
हुस्न
पे
ये
बहार
रहने
दो
जिस्म
कोरा
ही
यार
रहने
दो
शौक़
है
मय-कशी
का
हमको
भी
हल्का
हल्का
ख़ुमार
रहने
दो
वा'दा
है
वा'दा
मैं
निभाऊँगा
आँखों
को
बेक़रार
रहने
दो
एक
दिन
होना
है
रिहा
सबको
ख़ाली
अंकुर
दयार
रहने
दो
- Ankur Mishra
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ज़ख़्म
वो
ताज़ा
कर
देता
है
सर
वो
शानों
पे
धर
देता
है
कैसे
देखूँ
कोई
आइना
आँख
तर
वो
ये
कर
देता
है
जाऊँ
मैं
ले
के
ख़ुद
को
कहाँ
मुफ़्त
दिल
में
वो
घर
देता
है
मैं
बचाता
हूँ
ख़ुद
को
वो
पर
ख़्वाब
से
रातें
भर
देता
है
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दिल
ही
तो
टूटा
है
हम
मरे
तो
नहीं
रास्ते
ख़त्म
सारे
हुए
तो
नहीं
ढूँढ़
लूँगा
मैं
फिर
ख़ुद
को
तुम
देखना
आइना
आइने
से
परे
तो
नहीं
मुद्दतों
से
हैं
हम
दूर
घर
से
मगर
पास
ख़ुद
के
भी
लेकिन
गए
तो
नहीं
उम्र
गुज़री
है
इक
ख़ुद
से
लड़ते
मगर
मात
खा
कर
भी
हम
पर
मरे
तो
नहीं
रात
भर
जागता
हूँ
ये
माना
मैं
पर
मर्ज़
ये
उसके
ही
वास्ते
तो
नहीं
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इस
सेे
पहले
दरार
आ
जाए
आइने
पे
निखार
आ
जाए
धूल
पड़ने
लगी
है
आँखों
में
काश
रश्क-ए-बहार
आ
जाए
नींद
आने
से
पहले
ख़्वाबों
में
थोड़ी
'अंकुर'
फुहार
आ
जाए
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घर
से
मंज़िल
का
पता
लेकर
उड़
गए
सब
घोंसला
लेकर
अक्श
आँखों
में
है
ज़िंदा
इक
टूटे
ख़्वाबों
की
सदा
लेकर
बेसबब
फिरते
हैं
दोनों
ही
इक
तमन्ना
जा-ब-जा
लेकर
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आइना
चुप
है
कहता
नहीं
है
मुझ
को
मैंने
भी
देखा
नहीं
है
धूप
पड़ती
है
चेहरे
पे
मेरे
पर्दा
उस
सेे
भी
होता
नहीं
है
इक
सी
है
यूँँ
तो
आदत
हमारी
हाथ
बस
वो
पकड़ता
नहीं
है
जानता
हूँ
ख़ता
है
मिरी
पर
होना
अच्छा
भी
अच्छा
नहीं
है
नोच
खाऊँ
न
ख़ुद
को
कहीं
मैं
मेरा
मुझ
में
ही
हिस्सा
नहीं
है
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