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Ankur Mishra
isse pahle daraar aa jaa.e
isse pahle daraar aa jaa.e | इस सेे पहले दरार आ जाए
- Ankur Mishra
इस
सेे
पहले
दरार
आ
जाए
आइने
पे
निखार
आ
जाए
धूल
पड़ने
लगी
है
आँखों
में
काश
रश्क-ए-बहार
आ
जाए
नींद
आने
से
पहले
ख़्वाबों
में
थोड़ी
'अंकुर'
फुहार
आ
जाए
- Ankur Mishra
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बस
सफ़र
ही
कर
रहा
हूँ
धीरे
धीरे
मर
रहा
हूँ
हाथ
में
कुछ
है
नहीं
पर
खोने
से
क्या
डर
रहा
हूँ
इक
ही
तो
था
यार
मेरा
ढूँढ़
जिसका
घर
रहा
हूँ
अब
करूँँ
किस
सेे
वफ़ा
मैं
इश्क़
ख़ुद
से
कर
रहा
हूँ
कब
उसे
देखा
नहीं
पर
ख़्वाब
उसी
के
भर
रहा
हूँ
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इश्क़
में
अब
ख़सारे
बहुत
हैं
इस
नदी
के
किनारे
बहुत
हैं
छोड़
के
जाएँ
कैसे
उसे
हम
पन्ने
उल्फ़त
के
खारे
बहुत
हैं
ले
न
जाए
चुरा
उसको
कोई
आसमाँ
में
सितारे
बहुत
हैं
कैसे
देखूँ
मैं
अब
आइना
ये
ज़ख़्म
इस
में
हमारे
बहुत
हैं
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आँखों
में
यादों
का
समुंदर
ढूँढ़ना
मुश्किल
है
अंदर
घर
के
ही
घर
ढूँढ़ना
उम्मीद
क़ायम
है
मगर
आसाँ
नहीं
तन्हा
लबों
पे
धुँधले
अक्षर
ढूँढ़ना
थे
साथ
जिस
में
हम
कभी
दोनों
बशर
मुमकिन
हो
तो
वो
एक
मंज़र
ढूँढ़ना
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आग
वो
जो
बुझाई
न
जाए
याद
वो
जो
भुलाई
न
जाए
क्यूँ
कहें
बे-वफ़ा
हम
उसे
फिर
हम
सेे
ही
जब
निभाई
न
जाए
सोचा
था
छोड़
दें
रस्ता
वो
पर
बात
हम
सेे
बनाई
न
जाए
जबसे
देखा
है
वो
चाँद
हमने
शम्अ
तब
से
जलाई
न
जाए
मत
करो
हम
सेे
अब
ज़िक्र
उसका
अब
ये
उल्फ़त
छुपाई
न
जाए
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हम-नशीं
उस
हम-नवा
से
बे-ख़बर
थे
हम
वफ़ा
से
सम्त
उसकी
थे
मगर
सब
दूर
थे
दस्त-ए-शिफ़ा
से
रात
भर
जलते
रहे
हम
क्यूँ
वफ़ा
कर
के
हवा
से
आसमाँ
है
ख़्वाहिशों
का
इस
ज़मीं
पे
उस
सदास
हर
दफ़ा
ज़ख़्मी
हुए
हैं
ख़्वाब
मेरे
बा-हया
से
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