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Ankur Mishra
aankhoñ men yaadon ka samandar dhundhna
aankhoñ men yaadon ka samandar dhundhna | आँखों में यादों का समुंदर ढूँढ़ना
- Ankur Mishra
आँखों
में
यादों
का
समुंदर
ढूँढ़ना
मुश्किल
है
अंदर
घर
के
ही
घर
ढूँढ़ना
उम्मीद
क़ायम
है
मगर
आसाँ
नहीं
तन्हा
लबों
पे
धुँधले
अक्षर
ढूँढ़ना
थे
साथ
जिस
में
हम
कभी
दोनों
बशर
मुमकिन
हो
तो
वो
एक
मंज़र
ढूँढ़ना
- Ankur Mishra
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बा-ख़ुदा
इस
बे-ख़ुदी
से
बच
न
पाए
ज़िंदगी
से
है
अज़िय्यत
भी
मोहब्बत
पूछ
ले
इस
बेबसी
से
ख़ामख़ाँ
करते
रहे
हम
यार
तौबा
ख़ुद-कुशी
से
रक़्स
करती
ये
हवाएँ
फिर
चली
हैं
उस
गली
से
बे-ख़बर
हैं
तितलियाँ
भी
जान
मेरी
उस
कली
से
किस
तरह
करते
वफ़ा
हम
यार
तेरी
दिल-लगी
से
रहनुमा
है
हम-नशीं
वो
रोज़
कहते
हैं
उसी
से
इसलिए
शायद
कभी
हम
मिल
न
पाए
बे-कली
से
रह
गए
कुछ
फ़ासले
भी
यार
'अंकुर'
की
कमी
से
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दर-ब-दर
बेज़ार
होना
है
मान
लेते
हैं
कि
रोना
है
मुद्दतों
से
बह
रहा
हूँ
मैं
और
कितना
अब
डुबोना
है
रंग
फीके
पड़
गए
सारे
हिस्से
मेरे
बस
ये
कोना
है
हाल
किसको
अब
बताएँ
हम
किसलिए
नश्तर
चुभोना
है
देखते
हो
क्यूँ
मुझे
ऐसे
अश्क
आँखों
में
पिरोना
है
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मुतमइन
सारा
ज़माना
है
मुख़्तसर
अपना
ठिकाना
है
घोंट
दे
साँसें
न
दम
जानाँ
सहरा
सहरा
गुल
खिलाना
है
चंद
लम्हें
चंद
रातें
बस
और
साहिब
क्या
बहाना
है
सिलवटें
पड़ने
लगी
हैं
फिर
ज़र्फ़
अपना
आज़माना
है
ज़िंदगी
से
आख़िरी
'अंकुर'
मौत
को
रिश्ता
निभाना
है
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दर्द
से
ही
दर्द
को
आराम
आएगा
साथ
रख
ये
ज़ख़्म
तेरे
काम
आएगा
कौन
अपना
है
यहाँ
आवाज़
किसको
दें
कौन
लेने
सर
तिरा
इल्ज़ाम
आएगा
मुद्दतों
रहता
हूँ
जाने
गुम
कहाँ
मैं
भी
ख़त
कोई
कैसे
मिरे
फिर
नाम
आएगा
फ़ासलों
में
कट
न
जाए
ज़िंदगी
सारी
दूर
जितना
है
वो
बस
पैग़ाम
आएगा
सोचता
हूँ
लौट
जाऊँ
अब
यहाँ
से
मैं
कौन
'अंकुर'
होने
अब
बदनाम
आएगा
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वो
भी
तो
इक
सनम
व्यापार
ही
था
मोहब्बत
तेरा
कारोबार
ही
था
लबों
को
छू
के
जो
गुज़री
थी
मेरे
सुना
है
ज़हर
तू
वो
यार
ही
था
करूँँ
कैसे
यक़ीं
तुझपे
बता
मैं
कभी
तू
भी
तो
इक
अय्यार
ही
था
मिरी
हिस्से
में
थीं
बस
ये
लकीरें
मैं
तो
तेरे
लिए
बेकार
ही
था
मुझे
आती
नहीं
ये
आशिक़ी
पर
तू
भी
तो
अरसे
से
बेज़ार
ही
था
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