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Ankur Mishra
hum-nasheen us ham-nava se
hum-nasheen us ham-nava se | हम-नशीं उस हम-नवा से
- Ankur Mishra
हम-नशीं
उस
हम-नवा
से
बे-ख़बर
थे
हम
वफ़ा
से
सम्त
उसकी
थे
मगर
सब
दूर
थे
दस्त-ए-शिफ़ा
से
रात
भर
जलते
रहे
हम
क्यूँ
वफ़ा
कर
के
हवा
से
आसमाँ
है
ख़्वाहिशों
का
इस
ज़मीं
पे
उस
सदास
हर
दफ़ा
ज़ख़्मी
हुए
हैं
ख़्वाब
मेरे
बा-हया
से
- Ankur Mishra
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ऐसा
कुछ
यार
कर
जाते
हम
एक
पल
में
बिखर
जाते
हम
जिस
तरह
छोड़ा
उसने
हमें
लाज़िमी
था
के
मर
जाते
हम
खो
गई
साँसें
जिन
गलियों
में
छोड़
वो
दर
किधर
जाते
हम
इक
वो
ही
तो
था
अपना
बशर
लौट
के
कैसे
घर
जाते
हम
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उस
से
अब
मिलना
होता
नहीं
क्यूँ
तो
पर
अब
मैं
रोता
नहीं
खाए
हैं
ज़ख़्म
इतने
कि
अब
दर्द
से
दर्द
होता
नहीं
शब
इक
आया
था
वो
ख़्वाब
में
रात
से
उस
मैं
सोता
नहीं
आख़िरी
इश्क़
था
वा
मेरा
कुछ
भी
तब
से
मैं
खोता
नहीं
है
वो
मौजूद
हर
क़तरे
में
मैं
तभी
आँख
धोता
नहीं
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रोए
फिर
हँसकर
दिखाना
ही
पड़ा
हम
भी
ज़िंदा
हैं
बताना
ही
पड़ा
दर्द
हो
जाए
न
तन्हा
इसलिए
भूल
के
सब
मुस्कुराना
ही
पड़ा
रंग
इतने
थे
ज़माने
में
मगर
मय
को
पानी
से
मिलाना
ही
पड़ा
इक
तमन्ना
की
थी
मैंने
और
बस
हाथ
ज़ख़्मों
से
हटाना
ही
पड़ा
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आसमाँ
को
फिर
ज़मीं
से
जोड़
आते
हम
भी
दिल
वैसे
ही
उसका
तोड़
आते
गर
न
होती
इतनी
उल्फ़त
यार
से
जो
छाले
फिर
पैरों
के
उसके
फोड़
आते
मुद्दतों
जागे
हैं
जिसकी
याद
में
हम
कर
के
पागल
उसको
भी
हम
छोड़
आते
जो
किया
होता
न
वा'दा
उम्र
भर
का
क़स
में
सारी
हम
भी
'अंकुर'
तोड़
आते
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है
जहाँ
सारा
अपना
मगर
घर
कहाँ
हम
परिंदों
का
कोई
मुक़द्दर
कहाँ
इन
लकीरों
में
रहती
है
तन्हा
सहर
दूर
मुझ
सेे
सनम
वो
सितमगर
कहाँ
जिस्म
से
नोच
लेती
है
कपड़े
तलक़
सिलवटें
यार
आँखों
के
अंदर
कहाँ
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