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Ankur Mishra
us se ab milnaa hota nahin
us se ab milnaa hota nahin | उस से अब मिलना होता नहीं
- Ankur Mishra
उस
से
अब
मिलना
होता
नहीं
क्यूँ
तो
पर
अब
मैं
रोता
नहीं
खाए
हैं
ज़ख़्म
इतने
कि
अब
दर्द
से
दर्द
होता
नहीं
शब
इक
आया
था
वो
ख़्वाब
में
रात
से
उस
मैं
सोता
नहीं
आख़िरी
इश्क़
था
वा
मेरा
कुछ
भी
तब
से
मैं
खोता
नहीं
है
वो
मौजूद
हर
क़तरे
में
मैं
तभी
आँख
धोता
नहीं
- Ankur Mishra
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इस
त'अल्लुक़
में
नहीं
मुमकिन
तलाक़
ये
मोहब्बत
है
कोई
शादी
नहीं
Anwar Shaoor
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सुबूत
है
ये
मोहब्बत
की
सादा-लौही
का
जब
उस
ने
वा'दा
किया
हम
ने
ए'तिबार
किया
Josh Malihabadi
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बैठा
हूँ
अभी
सामने
और
सोच
रहा
हूँ
इज़हार
पे
मेरे
भला
क्या
मेरा
बनेगा
Afzal Ali Afzal
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फ़ुर्सत
नहीं
मुझे
कि
करूँँ
इश्क़
फिर
से
अब
माज़ी
की
चोटों
से
अभी
उभरा
नहीं
हूँ
मैं
डर
है
कहीं
ये
ऐब
उसे
रुस्वा
कर
न
दे
सो
ग़म
में
भी
शराब
को
छूता
नहीं
हूँ
मैं
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Harsh saxena
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यूँँ
कहें
नुमाइशों
के
दिन
क़रीब
आ
गए
महज़
फ़रवरी
हो
किस
तरह
महीना
इश्क़
का
Neeraj Neer
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और
भी
दुख
हैं
ज़माने
में
मोहब्बत
के
सिवा
राहतें
और
भी
हैं
वस्ल
की
राहत
के
सिवा
Faiz Ahmad Faiz
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जिसको
फ़ुज़ूल
लगती
थी
रब
की
इबादतें
पाने
को
इश्क़
टूटते
तारे
पे
आ
गया
Om awasthi
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उन
आँखों
का
मुझ
से
कोई
वा'दा
तो
नहीं
है
थोड़ी
सी
मोहब्बत
है
ज़ियादा
तो
नहीं
है
Firasat rizvi
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ख़ुदा
ने
फ़न
दिया
हमको
कि
लड़के
इश्क़
लिखेंगे
ख़ुदा
कब
जानता
था
हम,
ग़ज़ल
में
दर्द
भर
देंगे
Prashant Sharma Daraz
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देख
मोहब्बत
का
दस्तूर
तू
मुझ
से
मैं
तुझ
से
दूर
कोशिश
लाज़िम
है
प्यारे
आगे
जो
उसको
मंज़ूर
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Nasir Kazmi
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फिर
उसी
की
प्यास
में
थे
ज़िंदगी
की
आस
में
थे
हम
कभी
ऐ
हम-नशीं
उस
हम-नवा
के
ख़ास
में
थे
फ़ासलों
से
राब्तों
तक
दर्द
ही
अहसास
में
थे
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Ankur Mishra
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आदतन
मुस्कुरा
लेते
हैं
यूँँ
ही
बस
गुनगुना
लेते
हैं
पूछता
है
कोई
हाल
जब
अश्क
अपने
छुपा
लेते
हैं
हम
ने
देखा
है
घर
उसका
पर
क़स
में
हम
झूठी
खा
लेते
हैं
उसको
आए
न
आए
मगर
हम
तो
ख़ुद
से
निभा
लेते
हैं
आता
है
याद
वो
जब
कभी
होंठों
से
मय
लगा
लेते
हैं
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Ankur Mishra
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ये
हवा
ये
फ़ज़ा
दिल
दुखाने
लगे
भूल
जाना
अगर
याद
आने
लगे
शाम
ढलती
है
चादर
लिए
रात
की
इसलिए
आइना
सब
छुपाने
लगे
तंग
हैं
इन
सदाओं
से
हम
भी
मगर
क्या
करें
प्यास
दरिया
बढ़ाने
लगे
उम्र
ढलने
लगी
है
तिरी
ज़िंदगी
हर्फ़-दर-हर्फ़
हम
लड़खड़ाने
लगे
पूछते
थे
पता
लोग
मुझ
सेे
तिरा
इसलिए
हम
क़सम
झूठी
खाने
लगे
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Ankur Mishra
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इश्क़
में
अब
ख़सारे
बहुत
हैं
इस
नदी
के
किनारे
बहुत
हैं
छोड़
के
जाएँ
कैसे
उसे
हम
पन्ने
उल्फ़त
के
खारे
बहुत
हैं
ले
न
जाए
चुरा
उसको
कोई
आसमाँ
में
सितारे
बहुत
हैं
कैसे
देखूँ
मैं
अब
आइना
ये
ज़ख़्म
इस
में
हमारे
बहुत
हैं
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Ankur Mishra
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जैसे
तैसे
गुज़र
तो
रही
है
ज़िंदगी
ये
सँवर
तो
रही
है
है
गिला
उसको
माना
मगर
ये
आँख
जुर्माना
भर
तो
रही
है
हम
सेे
मत
पूछो
अब
नाम
उसका
रात
इक़रार
कर
तो
रही
है
कब
से
बैठा
हूँ
बद-हाल
मैं
पर
याद
उसकी
निख़र
तो
रही
है
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Ankur Mishra
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