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Ankur Mishra
zaKHm vo taaza kar deta hai
zaKHm vo taaza kar deta hai | ज़ख़्म वो ताज़ा कर देता है
- Ankur Mishra
ज़ख़्म
वो
ताज़ा
कर
देता
है
सर
वो
शानों
पे
धर
देता
है
कैसे
देखूँ
कोई
आइना
आँख
तर
वो
ये
कर
देता
है
जाऊँ
मैं
ले
के
ख़ुद
को
कहाँ
मुफ़्त
दिल
में
वो
घर
देता
है
मैं
बचाता
हूँ
ख़ुद
को
वो
पर
ख़्वाब
से
रातें
भर
देता
है
- Ankur Mishra
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तकल्लुफ़
छोड़कर
आओ
उसे
फिर
से
जिया
जाए
हमारा
बचपना
जो
एल्बमों
में
क़ैद
रहता
है
Shiva awasthi
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ये
काम
दोनों
तरफ़
हुआ
है
उसे
भी
आदत
पड़ी
है
मेरी
Shariq Kaifi
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मैं
तो
मुद्दत
से
ग़ैर-हाज़िर
हूँ
बस
मेरा
नाम
है
रजिस्टर
में
याद
करती
हैं
तुझको
दीवारें
शक्ल
उभर
आई
है
पलस्तर
में
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Azhar Nawaz
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मुझ
को
बीमार
करेगी
तिरी
आदत
इक
दिन
और
फिर
तुझ
से
भी
अच्छा
नहीं
हो
पाऊँगा
Rahul Jha
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खड़ा
हूँ
आज
भी
रोटी
के
चार
हर्फ़
लिए
सवाल
ये
है
किताबों
ने
क्या
दिया
मुझ
को
Nazeer Baaqri
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लबों
में
आ
के
क़ुल्फ़ी
हो
गए
अश'आर
सर्दी
में
ग़ज़ल
कहना
भी
अब
तो
हो
गया
दुश्वार
सर्दी
में
Sarfaraz Shahid
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वो
आँखें
चुप
थीं
लेकिन
हँस
रही
थीं
मेरा
जी
कर
रहा
था
चूम
लूँ
अब
Ritesh Rajwada
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इस
का
अपनी
ही
रवानी
पर
नहीं
है
इख़्तियार
ज़िंदगी
शिव
की
जटाओं
में
है
गंगा
की
तरह
Ayush Charagh
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पहले
पानी
को
और
हवा
को
बचाओ
ये
बचा
लो
तो
फिर
ख़ुदा
को
बचाओ
Swapnil Tiwari
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दो
घड़ी
को
पास
आया
था
कोई
दिल
पे
बरसों
हुक्मरानी
कर
गया
Subhan Asad
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तल्ख़
तेरी
मैं
निगाहों
से
हूँ
परेशाँ
इन
घटाओं
से
बाँध
ले
ज़ुल्फ़ों
में
अपनी
तू
तंग
हूँ
मैं
इन
हवाओं
से
ढूँढ़
ले
माँझी
किनारा
अब
कह
रहे
हैं
पाँव
नावों
से
किस
तरह
रक्खूँ
कोई
जानाँ
राब्ता
तेरी
मैं
बाहों
से
जल
रहे
हैं
जब
अना
में
ही
बे-ख़बर
ये
लोग
छाँव
से
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Ankur Mishra
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आसमाँ
को
भी
एहसास
है
बूॅंद
भर
दरिया
के
पास
है
बेसबब
कोई
मरता
नहीं
ज़िंदगी
से
बड़ी
प्यास
है
टूट
जानी
है
उम्मीद
ये
मर्ज़
को
दर्द
से
आस
है
साथ
चलते
हैं
कुछ
दूर
तक
वक़्त
कुछ
वक़्त
के
पास
है
मसअला
यार
साँसों
का
है
कौन
वर्ना
यहाँ
ख़ास
है
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Ankur Mishra
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जैसे
तैसे
गुज़र
तो
रही
है
ज़िंदगी
ये
सँवर
तो
रही
है
है
गिला
उसको
माना
मगर
ये
आँख
जुर्माना
भर
तो
रही
है
हम
सेे
मत
पूछो
अब
नाम
उसका
रात
इक़रार
कर
तो
रही
है
कब
से
बैठा
हूँ
बद-हाल
मैं
पर
याद
उसकी
निख़र
तो
रही
है
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Ankur Mishra
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जिस्म
जलने
लगा
है
तिरी
तिश्नगी
से
सनम
प्यास
बुझती
नहीं
क्यूँ
मिरी
मय-कशी
से
सनम
एक
अर्सा
हुआ
क्यूँ
तिरी
याद
आई
नहीं
एक
अर्सा
हुआ
बिछड़े
मुझ
को
ख़ुशी
से
सनम
देख
कर
आइना
सोचता
हूँ
मैं
अक्सर
यही
टूट
जाए
न
रिश्ता
कहीं
बे-ख़ुदी
से
सनम
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Ankur Mishra
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भूल
कर
भूल
ये
कर
गए
ख़्वाह-मख़ाह
उस
पे
हम
मर
गए
छोड़
आए
थे
जिस
राह
को
चल
के
फिर
उस
पे
ही
घर
गए
जाने
कब
होगी
बरसात
ये
आइना
देख
हम
डर
गए
खुश्क
थीं
आँखें
ये
पर
मगर
दर्द
से
यार
हम
भर
गए
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Ankur Mishra
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