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Ankur Mishra
hamne ro ke shab guzaari hai
hamne ro ke shab guzaari hai | हमने रो के शब गुज़ारी है
- Ankur Mishra
हमने
रो
के
शब
गुज़ारी
है
यादों
की
इतनी
उधारी
है
कर
लूँ
कैसे
ख़ुद-कुशी
यूँँ
ही
जान
भी
तो
ये
तुम्हारी
है
हक़
है
तुझको
छोड़
जाए
तू
रात
काली
अब
हमारी
है
मुझको
है
मालूम
हर
रस्ता
इश्क़
भी
ये
रोग
भारी
है
- Ankur Mishra
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जुड़
सकूँ
ख़ुद
से
कोई
आधार
दे
ऐ
ख़ुदा
साँसों
को
अब
रफ़्तार
दे
पा
लिया
मैंने
बदन
लेकिन
मुझे
इक
मुकम्मल
ज़िंदगी
किरदार
दे
डूब
जाए
तिश्नगी
में
तिश्नगी
यार
सहराओं
को
भी
पतवार
दे
हो
रहे
हैं
राब्ते
ग़ैरों
से
अब
हम-नशीं
मेरे
मिरी
अग़्यार
दे
आख़िरी
तो
आख़िरी
ही
फिर
सही
इक
दफ़ा
ता'बीर
तो
सरकार
दे
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Ankur Mishra
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पल
दो
पल
की
मुलाक़ात
में
आ
गए
उसकी
हर
बात
में
पास
अब
वो
नहीं
मेरे
पर
जागे
हैं
साथ
हर
रात
में
माना
मुश्किल
है
ये
इश्क़
पर
भीगे
हैं
सब
ही
बरसात
में
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Ankur Mishra
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वादा-ए-उल्फ़त
नहीं
करते
ख़ाली
पैमाने
नहीं
भरते
हो
गई
है
ख़ुद
की
आदत
अब
रिंदों
से
हम
अब
नहीं
डरते
उसको
लाओ
क़त्ल
करने
को
यार
ऐसे
हम
नहीं
मरते
छोड़
आया
हूँ
वो
दर
मैं
अब
ज़ख़्म
फिर
क्यूँ
ये
नहीं
भरते
जाने
किसकी
है
ये
साज़िश
जो
वो
यक़ीं
हम
पे
नहीं
करते
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Ankur Mishra
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तंज
ख़ुद
की
आँखों
के
सह
कर
लौट
आए
दरिया
से
बह
कर
छोड़
दो
तन्हा
ही
मुझको
तुम
देखा
है
सच
मैंने
भी
कह
कर
हो
यक़ीं
कैसे
किसी
पे
अब
कोई
दिल
रखता
नहीं
गह
कर
छोड़ो
क़स
में
झूठी
ये
'अंकुर'
टूट
जाएगा
ये
भी
चह
कर
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Ankur Mishra
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इश्क़
में
अब
ख़सारे
बहुत
हैं
इस
नदी
के
किनारे
बहुत
हैं
छोड़
के
जाएँ
कैसे
उसे
हम
पन्ने
उल्फ़त
के
खारे
बहुत
हैं
ले
न
जाए
चुरा
उसको
कोई
आसमाँ
में
सितारे
बहुत
हैं
कैसे
देखूँ
मैं
अब
आइना
ये
ज़ख़्म
इस
में
हमारे
बहुत
हैं
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Ankur Mishra
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