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Ankur Mishra
us rah-guzar se phir guzarne ke li.e
us rah-guzar se phir guzarne ke li.e | उस रह-गुज़र से फिर गुज़रने के लिए
- Ankur Mishra
उस
रह-गुज़र
से
फिर
गुज़रने
के
लिए
मरना
पड़ेगा
ज़ख़्म
भरने
के
लिए
ज़िंदा
हूँ
अब
तक
बे-सबब
मैं
ज़िंदगी
सदमा
यही
काफ़ी
है
मरने
के
लिए
इस
तिश्नगी
से
कब
तलक़
लड़ता
सनम
तैयार
था
वो
भी
मुकरने
के
लिए
इक
आइने
से
पूछता
है
आइना
क्या
चाहिए
अंकुर
बिखरने
के
लिए
- Ankur Mishra
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टूटते
हैं
बिखर
जाते
हैं
साँस
लेते
ही
मर
जाते
हैं
साथ
इक
शब
नहीं
गुज़री
पर
वा'दा
'उम्रों
का
कर
जाते
हैं
जिस
तरह
नम
हैं
आँखें
मिरी
लोग
सपनों
से
डर
जातें
हैं
ज़ख़्म
पे
ज़ख़्म
देते
रहो
चेहरे
कुछ
बन
सँवर
जाते
हैं
दूर
है
शहर
उसका
अभी
लौट
कर
हम
भी
घर
जाते
हैं
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आख़िरी
ख़त
आख़िरी
पैग़ाम
है
मुझ
पे
मेरे
क़त्ल
का
इल्ज़ाम
है
सो
गए
मुझको
जगा
के
ख़्वाब
भी
किस
क़दर
तन्हा
ये
सुब्ह-ओ-शाम
है
ख़ामख़ाँ
करता
रहा
फ़रियाद
मैं
दर्द
देना
ही
तो
उसका
काम
है
जुर्म
साबित
हो
नहीं
पाया
कभी
मय-कदों
में
आना
जाना
आम
है
थी
मोहब्बत
यूँँ
तो
उसको
भी
मगर
नाम
'अंकुर'
बस
मिरा
बदनाम
है
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दर्द
से
लबरेज़
रहने
दो
अश्क
ये
आँखों
से
बहने
दो
फिर
नहीं
होनी
मोहब्बत
ये
लाश
अरमानों
की
दहने
दो
कब
से
चुप
हैं
आँखें
दोनों
ये
कुछ
इन्हें
भी
अब
तो
कहने
दो
जाने
मिलना
हो
न
दोबारा
अब
तो
ये
दीवार
ढ़हने
दो
चाहा
वा'दा
कब
कोई
यारा
दर्द
मुझको
तुम
ये
सहने
दो
मत
करो
इतनी
मोहब्बत
तुम
मुझको
अब
बेज़ार
रहने
दो
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सौ
बहाने
थे
जब
ख़ुद-कुशी
के
ख़्वाब
देखे
थे
तब
ज़िंदगी
के
इस
तरह
छोड़
कर
ख़ुद
को
कैसे
यार
होते
कभी
हम
किसी
के
ख़्वाब
आँखों
में
तन्हा
हैं
जानाँ
पी
गया
अश्क
कोई
सभी
के
कब
तलक
इस
तरह
हम
किसी
को
ज़ख़्म
'अंकुर'
दिखाएँ
किसी
के
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अपनी
अना
के
मारे
हैं
हर
बार
ख़ुद
से
हारे
हैं
कैसे
रखें
मरहम
कोई
ये
ज़ख़्म
हमको
प्यारे
हैं
देखो
कभी
इन
आँखों
में
वादे
वो
इन
में
सारे
हैं
हम
देखें
कैसे
आइना
आँखों
से
हम
भी
खारे
हैं
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