nikli jo aaj tak na kisi ki zabaan se | निकली जो आज तक न किसी की ज़बान से

  - Kaif Ahmad Siddiqui
निकलीजोआजतककिसीकीज़बानसे
टकरारहीहैबातवहीमेरेकानसे
सोतारहामैंख़ौफ़कीचादरलपेटकर
आसेबचीख़तेरहेख़ालीमकानसे
अक्सरमैंएकज़हरबुझेतीरकीतरह
निकलाहूँहादसातकीतिरछीकमानसे
फैलाहुआहैहद्द-ए-नज़रतकसुकूत-ए-मर्ग
आवाज़देरहाहैकोईआसमानसे
तन्हाइयोंकोसौंपकेतारीकियोंकाज़हर
रातोंकोभागआएहमअपनेमकानसे
मुमकिनहैख़ूबखुलकेहोगुफ़्त-ओ-शुनीदआज
वोभीख़फ़ाहैहमभीहैंकुछबद-गुमानसे
'कैफ़'जिनकोबुग़्ज़नईशा'इरीसेहै
वोभीतिरेकलामकोपढ़तेहैंध्यानसे
  - Kaif Ahmad Siddiqui
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