ham ek dhalti hui dhoop ke ta'aqub men | हम एक ढलती हुई धूप के तआक़ुब में

  - Kaif Ahmad Siddiqui
हमएकढलतीहुईधूपकेतआक़ुबमें
हैंतेज़-गामसाएसाएजातेहैं
चमनमेंशिद्दत-ए-दर्द-ए-नुमूदसेग़ुंचे
तड़परहेहैंमगरमुस्कुराएजातेहैं
मैंवोख़िज़ाँकाबरहना-बदनशजरहूँजिसे
लिबास-ए-ज़ख़्म-ए-बहाराँपहनाएजातेहैं
शफ़क़कीझीलमेंजबभीहैडूबतासूरज
तोपासधूपहीजातीसाएजातेहैं
येज़िंदगीवोतड़पतीग़ज़लहै'कैफ़'जिसे
हरएकसाज़-ए-हवादिसपेगाएजातेहैं
  - Kaif Ahmad Siddiqui
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