duniya saji hui hai jo bazaar ki tarah | दुनिया सजी हुई है जो बाज़ार की तरह

  - Kabir Ahmad Jaisi
दुनियासजीहुईहैजोबाज़ारकीतरह
मैंभीचलूँगाआजख़रीदारकीतरह
टूटेहोंयापुरानेहोंअपनेतोहैंयही
ख़्वाबोंकोजम्अ''करताहूँआसारकीतरह
येऔरबातहैकिनुमायाँरहूँमगर
दुनियामुझेछुपाएहैआज़ारकीतरह
मेरीकिताब-ए-ज़ीस्ततुमइकबारतोपढ़ो
फिरचाहेफेंकदोकिसीअख़बारकीतरह
अबज़िंदगीकीधूपभीसीधाकरेगीक्या
अबतकमैंकजरहातिरीदस्तारकीतरह
मुद्दतहुईकिघूमताफिरताहूँरात-दिन
अफ़्कारकेदयारमेंनादारकीतरह
इसख़ौफ़सेकिसायाभीअपनाछूटजाए
रुकरुककेचलरहाहूँमैंबीमारकीतरह
  - Kabir Ahmad Jaisi
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