lootne ko to gham-e-dehr ne lootaa ab tak | लूटने को तो ग़म-ए-दह्र ने लूटा अब तक

  - Kabir Ahmad Jaisi
लूटनेकोतोग़म-ए-दह्रनेलूटाअबतक
मैंवोशीशाहूँकिपत्थरसेटूटाअबतक
ज़हरदेतीरहीहरगामपेदुनियामुझको
दामन-ए-ज़ीस्ततोहाथोंसेछूटाअबतक
उनसेमिलआयामगरसोचरहाहूँअबभी
नग़्माक्यूँबिखराहैक्यूँसाज़हैटूटाअबतक
क्याकियातुमनेजोइसतरहख़जिलहोतेहो
मेराएहसासथाजिसनेमुझेलूटाअबतक
दश्त-ए-पुर-ख़ारहैकहतेहैंयेदुनियाजिसको
आबलादिलकामगरफिरभीफूटाअबतक
राहतोराहहैमंज़िलभीछुटीहैपीछे
गर्दिश-ए-वक़्ततिरासाथछूटाअबतक
मौज-ओ-गिर्दाबसेशिकवातोनहींकोई'सबा'
मुझकोबे-मेहरी-ए-साहिलनेहीलूटाअबतक
  - Kabir Ahmad Jaisi
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy