kuchh tum se shikaayat thii na duniya se gilaa tha | कुछ तुम से शिकायत थी न दुनिया से गिला था

  - Kabir Ahmad Jaisi
कुछतुमसेशिकायतथीदुनियासेगिलाथा
मैंयूँँहीज़रादेरकोख़ामोशहुआथा
वोउम्र-ए-गुरेज़ाँहोकिहोतेरातसव्वुर
साएकीतरहसाथमिरेकोईलगाथा
क्याजानिएकिसवास्तेमस्लूबहुआहूँ
दुनियामेंतोबहुतोंनेतिरानामलियाथा
जातेगरसामनेदरियाकेकिनारे
मैंहिज्र-ए-मुसलसलकोतिरेभूलचलाथा
वोवक़्तभीगुज़राहैकिजिद्दतकेजुनूँमें
मैंअपनीनवाओंकागलाघोंटरहाथा
सबभूलचुकामैंतोतिरीयादकाआलम
येयादहैइकबुलबुलापानीसेउठाथा
क्यावोभी'सबा'मुझकोपहचानसकेगा
हैरतसेजोआईनामुझेदेखरहाथा
  - Kabir Ahmad Jaisi
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