har ek rooh men ik gham chhupa lage hai mujhe | हर एक रूह में इक ग़म छुपा लगे है मुझे

  - Jaan Nisar Akhtar
हरएकरूहमेंइकग़मछुपालगेहैमुझे
येज़िंदगीतोकोईबद-दुआलगेहैमुझे
पसंद-ए-ख़ातिर-ए-अहल-ए-वफ़ाहैमुद्दतसे
येदिलकादाग़जोख़ुदभीभलालगेहैमुझे
जोआँसुओंमेंकभीरातभीगजातीहै
बहुतक़रीबवोआवाज़-ए-पालगेहैमुझे
मैंसोभीजाऊँतोक्यामेरीबंदआँखोंमें
तमामरातकोईझाँकतालगेहैमुझे
मैंजबभीउसकेख़यालोंमेंखोसाजाताहूँ
वोख़ुदभीबातकरेतोबुरालगेहैमुझे
मैंसोचताथाकिलौटूँगाअजनबीकीतरह
येमेरागाँवतोपहचानतालगेहैमुझे
जानेवक़्तकीरफ़्तारक्यादिखातीहै
कभीकभीतोबड़ाख़ौफ़सालगेहैमुझे
बिखरगयाहैकुछइसतरहआदमीकावजूद
हरएकफ़र्दकोईसानेहालगेहैमुझे
अबएकआधक़दमकाहिसाबक्यारखिए
अभीतलकतोवहीफ़ासलालगेहैमुझे
हिकायत-ए-ग़म-ए-दिलकुछकशिशतोरखतीहै
ज़मानाग़ौरसेसुनताहुआलगेहैमुझे
  - Jaan Nisar Akhtar
Share

profile-whatsappprofile-twitterprofile-fbprofile-copy