aa.e kya kya yaad nazar jab padti in daalaanon parus ka kaaghaz chipka dena ghar ke raushan-daanon par | आए क्या क्या याद नज़र जब पड़ती इन दालानों पर

  - Jaan Nisar Akhtar
आएक्याक्यायादनज़रजबपड़तीइनदालानोंपर
उसकाकाग़ज़चिपकादेनाघरकेरौशन-दानोंपर
आजभीजैसेशानेपरतुमहाथमिरेरखदेतीहो
चलतेचलतेरुकजाताहूँसारीकीदूकानोंपर
बरखाकीतोबातहीछोड़ोचंचलहैपुर्वाईभी
जानेकिसकासब्ज़दुपट्टाफेंकगईहैधानोंपर
शहरकेतपतेफ़ुटपाथोंपरगाँवकेमौसमसाथचलें
बूढ़ेबरगदहाथसारखदेंमेरेजलतेशानोंपर
सस्तेदामोंलेतोआतेलेकिनदिलथाभरआया
जानेकिसकानामख़ुदाथापीतलकेगुल-दानोंपर
उसकाक्यामन-भेदबताऊँउसकाक्याअंदाज़कहूँ
बातभीमेरीसुननाचाहेहाथभीरक्खेकानोंपर
औरभीसीनाकसनेलगताऔरकमरबलखाजाती
जबभीउसकेपाँवफिसलनेलगतेथेढलवानोंपर
शे'रतोउनपरलिक्खेलेकिनऔरोंसेमंसूबकिए
उनकोक्याक्याग़ुस्साआयानज़्मोंकेउनवानोंपर
यारोअपनेइश्क़केक़िस्सेयूँँभीकममशहूरनहीं
कलतोशायदनॉवेललिक्खेजाएँइनरूमानोंपर
  - Jaan Nisar Akhtar
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