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J E Najm
ek chehre pe ad gaya hooñ main
ek chehre pe ad gaya hooñ main | एक चेहरे पे अड़ गया हूँ मैं
- J E Najm
एक
चेहरे
पे
अड़
गया
हूँ
मैं
किस
मुसीबत
में
पड़
गया
हूँ
मैं
तू
समझ
हिज्र
मेरी
मर्ज़ी
है
तू
समझ
ख़ुद
बिछड़
गया
हूँ
मैं
जैसे
गुल-दाँ
ख़िज़ाँ
के
मौसम
में
देखो
कितना
उजड़
गया
हूँ
मैं
तेरी
इस्लाह
का
नतीजा
है
इस
क़दर
जो
बिगड़
गया
हूँ
मैं
नीलगूँ
झील
ये
बताती
है
तेरी
आँखों
को
लड़
गया
हूँ
मैं
- J E Najm
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मैं
सालों
बाद
जब
भी
गाँव
जाता
हूँ
लिए
पीपल
की
ठंडी
छाँव
जाता
हूँ
कहीं
मैली
न
हो
जाए
ये
जन्नत
मैं
माँ
के
पास
नंगे
पाँव
जाता
हूँ
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Ashok Sagar
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उम्र-भर
के
सज्दों
से
मिल
नहीं
सकी
जन्नत
ख़ुल्द
से
निकलने
को
इक
गुनाह
काफ़ी
है
Ambreen Haseeb Ambar
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तुम्हारे
पाँव
क़सम
से
बहुत
ही
प्यारे
हैं
ख़ुदा
करे
मेरे
बच्चों
की
इन
में
जन्नत
हो
Rafi Raza
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हो
गई
है
पीर
पर्वत
सी
पिघलनी
चाहिए
इस
हिमालय
से
कोई
गंगा
निकलनी
चाहिए
Dushyant Kumar
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मिरी
ज़बान
के
मौसम
बदलते
रहते
हैं
मैं
आदमी
हूँ
मिरा
ए'तिबार
मत
करना
Asim Wasti
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तुम्हें
ज़रूर
कोई
चाहतों
से
देखेगा
मगर
वो
आँखें
हमारी
कहाँ
से
लाएगा
तुम्हारे
साथ
ये
मौसम
फ़रिश्तों
जैसा
है
तुम्हारे
बा'द
ये
मौसम
बहुत
सताएगा
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Bashir Badr
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हम
क्या
जानें
जन्नत
कैसी
होती
है
उस
सेे
पूछो
जिसने
तुमको
पाया
है
Harsh saxena
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अगर
जन्नत
मिला
करती
फ़क़त
सज्दों
के
बदले
में
तो
फिर
इबलीस
मुर्शिद
सब
सेे
पहले
जन्नती
होता
Shajar Abbas
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लब-ए-दरिया
पे
देख
आ
कर
तमाशा
आज
होली
का
भँवर
काले
के
दफ़
बाजे
है
मौज
ऐ
यार
पानी
में
Shah Naseer
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नहीं
हर
चंद
किसी
गुम-शुदा
जन्नत
की
तलाश
इक
न
इक
ख़ुल्द-ए-तरब-नाक
का
अरमाँ
है
ज़रूर
बज़्म-ए-दोशंबा
की
हसरत
तो
नहीं
है
मुझ
को
मेरी
नज़रों
में
कोई
और
शबिस्ताँ
है
ज़रूर
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Asrar Ul Haq Majaz
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छोड़
ज़ंजीर
को
दुहाई
दे
ताकि
लोगों
को
भी
सुनाई
दे
कब
कहा
था
मुझे
ख़ुदाई
दे
मेरे
अंदर
से
तू
दिखाई
दे
खींच
सीने
से
तीर
धड़कन
का
खींच
ले
और
मुझे
रिहाई
दे
तेरी
जानिब
सुराग़
जाएगा
जान-ए-मन
इतनी
मत
सफ़ाई
दे
मैं
तिरी
आँख
में
उतर
पाऊँ
इस
क़दर
मुझ
को
भी
रसाई
दे
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J E Najm
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तेरे
जैसा
कमाल
कर
लेता
मैं
भी
रंजिश
बहाल
कर
लेता
रस्म-ए-उल्फ़त
का
पास
है
वर्ना
ग़ैर
ख़ुद
पे
हलाल
कर
लेता
तू
धड़कता
अगर
न
सीने
में
साँस
धड़कन
को
टाल
कर
लेता
अह्ल-ए-दुनिया
तो
अह्ल-ए-दुनिया
हैं
तू
तो
मेरा
ख़याल
कर
लेता
फूल
से
दोस्ती
निभानी
थी
कम
से
कम
आँख
लाल
कर
लेता
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J E Najm
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पल
दो
पल
की
जो
आशनाई
थी
मुझ
को
लगता
था
कल
ख़ुदाई
थी
मैं
ने
ठुकरा
दिया
था
दुनिया
को
जब
यहाँ
तू
पलट
के
आई
थी
फिर
किसी
दूसरे
की
हो
जाना
ये
बता
मुझ
में
क्या
बुराई
थी
माँगते
क्यूँ
हो
तुम
दलील-ए-ख़ुदा
गर
ख़ुदा
था
तो
ये
ख़ुदाई
थी
रोग
भी
मुश्तरक
जदीद
सा
था
हर
तरफ़
एक
ही
दुहाई
थी
जिस
के
लब
पर
सवाल
आया
था
आग
उस
ने
ही
आ
लगाई
थी
'नज्म'
उस
मोड़
पर
चले
आए
जिस
जगह
साँस
डगमगाई
थी
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बाद
मुद्दत
के
हिज्र
सा
देना
मेरे
हाथों
में
आइना
देना
अच्छा
लगता
है
इस
ज़माने
को
बाद
मरने
के
बुत
बना
देना
जी
ये
तौहीन
है
चराग़ों
की
रात
बाक़ी
हो
और
बुझा
देना
कैनवस
पर
बहार
उतरेगी
आप
कुछ
तितलियाँ
बना
देना
मशवरा
है
कि
हम
जिए
जाएँ
कितना
आसाँ
है
मशवरा
देना
ज़िंदगी
'नज्म'
ख़्वाब
जैसी
है
लुत्फ़
आने
लगे
जगा
देना
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एक
चेहरा
हदफ़
बनाने
पर
धर
लिया
क्यूँ
हमें
निशाने
पर
सोचता
हूँ
ये
क्या
तसलसुल
है
टूट
जाता
है
साँस
आने
पर
सारे
मोती
बिखरते
जाते
हैं
एक
धागे
के
टूट
जाने
पर
हिज्र
पीछे
ही
पड़
गया
मेरे
चंद
लम्हों
को
गुदगुदाने
पर
उँगलियाँ
'नज्म'
ख़ुद
पे
उठने
दे
तू
न
उँगली
उठा
ज़माने
पर
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J E Najm
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