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J E Najm
baad muddat ke hijr sa dena
baad muddat ke hijr sa dena | बाद मुद्दत के हिज्र सा देना
- J E Najm
बाद
मुद्दत
के
हिज्र
सा
देना
मेरे
हाथों
में
आइना
देना
अच्छा
लगता
है
इस
ज़माने
को
बाद
मरने
के
बुत
बना
देना
जी
ये
तौहीन
है
चराग़ों
की
रात
बाक़ी
हो
और
बुझा
देना
कैनवस
पर
बहार
उतरेगी
आप
कुछ
तितलियाँ
बना
देना
मशवरा
है
कि
हम
जिए
जाएँ
कितना
आसाँ
है
मशवरा
देना
ज़िंदगी
'नज्म'
ख़्वाब
जैसी
है
लुत्फ़
आने
लगे
जगा
देना
- J E Najm
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दर्द
चेहरा
पहन
के
आया
था
तेरा
चेहरा
था
सो
क़ुबूल
किया
Aslam Rashid
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यूँँ
देखते
रहना
उसे
अच्छा
नहीं
'मोहसिन'
वो
काँच
का
पैकर
है
तो
पत्थर
तिरी
आँखें
Mohsin Naqvi
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इतना
प्यारा
है
वो
चेहरा
कि
नज़र
पड़ते
ही
लोग
हाथों
की
लकीरों
की
तरफ़
देखते
हैं
Nadir Ariz
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शदीद
गर्मी
में
कैसे
निकले
वो
फूल-चेहरा
सो
अपने
रस्ते
में
धूप
दीवार
हो
रही
है
Shakeel Jamali
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इस
दौर
में
इंसान
का
चेहरा
नहीं
मिलता
कब
से
मैं
नक़ाबों
की
तहें
खोल
रहा
हूँ
Moghisuddin Fareedi
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चश्म
हो
तो
आईना-ख़ाना
है
दहर
मुँह
नज़र
आता
है
दीवारों
के
बीच
Meer Taqi Meer
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आइना
देख
कर
तसल्ली
हुई
हम
को
इस
घर
में
जानता
है
कोई
Gulzar
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बरसों
बाद
दिखा
चहरा
तो
समझे
हम
कैसे
इक
तस्वीर
पुरानी
होती
है
Shriyansh Qaabiz
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तेरा
लिक्खा
जो
पढ़ूँ
तो
तेरी
आवाज़
सुनूँ
तेरी
आवाज़
सुनूँ
तो
तेरा
चेहरा
देखूँ
Bhaskar Shukla
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चेहरा
धुँदला
सा
था
और
सुनहरे
झुमके
थे
बादल
ने
कानों
में
चाँद
के
टुकड़े
पहने
थे
इक
दूजे
को
खोने
से
हम
इतना
डरते
थे
ग़ुस्सा
भी
होते
तो
बातें
करते
रहते
थे
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Vikram Gaur Vairagi
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एक
चेहरे
पे
अड़
गया
हूँ
मैं
किस
मुसीबत
में
पड़
गया
हूँ
मैं
तू
समझ
हिज्र
मेरी
मर्ज़ी
है
तू
समझ
ख़ुद
बिछड़
गया
हूँ
मैं
जैसे
गुल-दाँ
ख़िज़ाँ
के
मौसम
में
देखो
कितना
उजड़
गया
हूँ
मैं
तेरी
इस्लाह
का
नतीजा
है
इस
क़दर
जो
बिगड़
गया
हूँ
मैं
नीलगूँ
झील
ये
बताती
है
तेरी
आँखों
को
लड़
गया
हूँ
मैं
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J E Najm
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एक
चेहरा
हदफ़
बनाने
पर
धर
लिया
क्यूँ
हमें
निशाने
पर
सोचता
हूँ
ये
क्या
तसलसुल
है
टूट
जाता
है
साँस
आने
पर
सारे
मोती
बिखरते
जाते
हैं
एक
धागे
के
टूट
जाने
पर
हिज्र
पीछे
ही
पड़
गया
मेरे
चंद
लम्हों
को
गुदगुदाने
पर
उँगलियाँ
'नज्म'
ख़ुद
पे
उठने
दे
तू
न
उँगली
उठा
ज़माने
पर
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J E Najm
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पल
दो
पल
की
जो
आशनाई
थी
मुझ
को
लगता
था
कल
ख़ुदाई
थी
मैं
ने
ठुकरा
दिया
था
दुनिया
को
जब
यहाँ
तू
पलट
के
आई
थी
फिर
किसी
दूसरे
की
हो
जाना
ये
बता
मुझ
में
क्या
बुराई
थी
माँगते
क्यूँ
हो
तुम
दलील-ए-ख़ुदा
गर
ख़ुदा
था
तो
ये
ख़ुदाई
थी
रोग
भी
मुश्तरक
जदीद
सा
था
हर
तरफ़
एक
ही
दुहाई
थी
जिस
के
लब
पर
सवाल
आया
था
आग
उस
ने
ही
आ
लगाई
थी
'नज्म'
उस
मोड़
पर
चले
आए
जिस
जगह
साँस
डगमगाई
थी
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J E Najm
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तेरे
जैसा
कमाल
कर
लेता
मैं
भी
रंजिश
बहाल
कर
लेता
रस्म-ए-उल्फ़त
का
पास
है
वर्ना
ग़ैर
ख़ुद
पे
हलाल
कर
लेता
तू
धड़कता
अगर
न
सीने
में
साँस
धड़कन
को
टाल
कर
लेता
अह्ल-ए-दुनिया
तो
अह्ल-ए-दुनिया
हैं
तू
तो
मेरा
ख़याल
कर
लेता
फूल
से
दोस्ती
निभानी
थी
कम
से
कम
आँख
लाल
कर
लेता
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J E Najm
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छोड़
ज़ंजीर
को
दुहाई
दे
ताकि
लोगों
को
भी
सुनाई
दे
कब
कहा
था
मुझे
ख़ुदाई
दे
मेरे
अंदर
से
तू
दिखाई
दे
खींच
सीने
से
तीर
धड़कन
का
खींच
ले
और
मुझे
रिहाई
दे
तेरी
जानिब
सुराग़
जाएगा
जान-ए-मन
इतनी
मत
सफ़ाई
दे
मैं
तिरी
आँख
में
उतर
पाऊँ
इस
क़दर
मुझ
को
भी
रसाई
दे
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J E Najm
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