KHvaab ki tarah bikhar jaane ko jee chahta hai | ख़्वाब की तरह बिखर जाने को जी चाहता है

  - Iftikhar Arif
ख़्वाबकीतरहबिखरजानेकोजीचाहताहै
ऐसीतन्हाईकिमरजानेकोजीचाहताहै
घरकीवहशतसेलरज़ताहूँमगरजानेक्यूँँ
शामहोतीहैतोघरजानेकोजीचाहताहै
डूबजाऊँतोकोईमौजनिशाँतकबताए
ऐसीनद्दीमेंउतरजानेकोजीचाहताहै
कभीमिलजाएतोरस्तेकीथकनजागपड़े
ऐसीमंज़िलसेगुज़रजानेकोजीचाहताहै
वहीपैमाँजोकभीजीकोख़ुशआयाथाबहुत
उसीपैमाँसेमुकरजानेकोजीचाहताहै
  - Iftikhar Arif
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