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Hrishita Singh
saare aangan bhi chup ho rahe hain
saare aangan bhi chup ho rahe hain | सारे आँगन भी चुप हो रहे हैं
- Hrishita Singh
सारे
आँगन
भी
चुप
हो
रहे
हैं
अब
तो
जंगल
भी
सब
रो
रहे
हैं
रूह
तो
कब
की
ही
मर
चुकी
है
अब
तो
हम
बस
बदन
ढो
रहे
हैं
सब
दरख़्तों
को
ये
काट
देते
फूल
गमलों
में
फिर
बो
रहे
हैं
रहते
कब
तक
उसी
वस्ल
में
हम
हिज्र
की
हम
वजह
हो
रहे
हैं
अब
नहीं
नींद
पूरी
मुनासिब
आधी
ही
नींद
बस
सो
रहे
हैं
सबकी
करते
थे
हम
ही
हिफ़ाज़त
अब
यहाँ
ख़ुद
ही
को
खो
रहे
हैं
ख़ाक
ही
तो
यहाँ
होते
हैं
सब
सब
सिकंदर
यहाँ
जो
रहे
हैं
ये
जो
आलम
मुनासिब
नहीं
था
हम
भी
इसकी
तरह
हो
रहे
हैं
- Hrishita Singh
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छोटी
सी
बात
पे
ख़ुश
होना
मुझे
आता
था
पर
बड़ी
बात
पे
चुप
रहना
तुम्ही
से
सीखा
Zehra Nigaah
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उस
की
बेचैनी
बढ़ाना
चाहती
हूँ
सुनिए
कह
कर
चुप
लगाना
चाहती
हूँ
Pooja Bhatia
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ये
पानी
ख़ामुशी
से
बह
रहा
है
इसे
देखें
कि
इस
में
डूब
जाएँ
Ahmad Mushtaq
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वो
आँखें
चुप
थीं
लेकिन
हँस
रही
थीं
मेरा
जी
कर
रहा
था
चूम
लूँ
अब
Ritesh Rajwada
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वो
शांत
बैठा
है
कब
से
मैं
शोर
क्यूँँॅं
न
करूँॅं
बस
एक
बार
वो
कह
दे
कि
चुप
तो
चूँ
न
करूँॅं
Charagh Sharma
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मेरी
तस्वीरें
जला
दो
साहिबा
और
फिर
शम्मा
बुझा
दो
साहिबा
एक
क़िस्सा
एक
लड़का
और
तुम
अब
तो
मुझ
को
चुप
करा
दो
साहिबा
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Anand Raj Singh
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अब
तो
चुप-चाप
शाम
आती
है
पहले
चिड़ियों
के
शोर
होते
थे
Mohammad Alvi
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शब-ए-हिज्रां
बुझा
बैठी
हूँ
मैं
सारे
सितारे
पर
कोई
फ़ानूस
रौशन
है
ख़मोशी
से
मेरे
अंदर
Kiran K
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आधी
रात
की
चुप
में
किस
की
चाप
उभरती
है
छत
पे
कौन
आता
है
सीढ़ियाँ
नहीं
खुलतीं
Parveen Shakir
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ये
सोच
कर
के
कि
उसने
किया
है
याद
मुझे
मैं
मेरी
उँगलियों
पे
हिचकियों
को
गिनता
रहा
पलट
के
उसने
कराया
न
मुझको
चुप
लेकिन
तमाम
रात
मेरी
सिसकियों
को
गिनता
रहा
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Dipendra Singh 'Raaz'
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कौन
रहता
ख़फ़ा
इतनी
सी
बात
पर
जीना
ही
कर
दिया
बार
इसी
बात
पर
मैं
ख़फ़ा
हूँ
अभी
उस
सेे
जिस
बात
पर
वो
भी
मुझ
सेे
ख़फ़ा
है
उसी
बात
पर
चाहती
हूँ
के
अब
मसअला
हल
हो,
वो
चाहता
है
लड़ाई
किसी
बात
पर
रंजिशें
मैं
मिटाती
रही
ज़ेहन
से
ताने
वो
दे
रहा
है
इसी
बात
पर
कहना
अबकी
लगाएगा
मुझको
गले
मुस्कुरा
वो
रहा
था
इसी
बात
पर
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Hrishita Singh
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दुनिया
के
ग़म
फिर
उसी
को
सौंप
कर
के
मैं
भी
आख़िर
हँस
ही
दूँगी
खिलखिला
कर
Hrishita Singh
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वो
मुझे
कितना
ही
जानता
है
वो
तो
लोगों
की
बस
मानता
है
उस
के
ही
ख़्वाब
तो
देखती
हूँ
पर
मुझे
दोस्त
वो
मानता
है
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Hrishita Singh
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देख
कर
तुम
भी
ज़ख़्म
मेरे
हो
हँसते
तुम
सेे
हमदर्दी
की
भी
हसरत
नहीं
है
Hrishita Singh
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उसकी
ही
यादों
में
पड़ा
रहता
है
ये
ये
मेरा
दिल
भी
कैसा
पगला
गया
है
Hrishita Singh
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