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Hrishita Singh
duniya ke gham phir usii ko saunp kar ke
duniya ke gham phir usii ko saunp kar ke | दुनिया के ग़म फिर उसी को सौंप कर के
- Hrishita Singh
दुनिया
के
ग़म
फिर
उसी
को
सौंप
कर
के
मैं
भी
आख़िर
हँस
ही
दूँगी
खिलखिला
कर
- Hrishita Singh
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इस
का
अपनी
ही
रवानी
पर
नहीं
है
इख़्तियार
ज़िंदगी
शिव
की
जटाओं
में
है
गंगा
की
तरह
Ayush Charagh
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यारो
कुछ
तो
ज़िक्र
करो
तुम
उस
की
क़यामत
बाँहों
का
वो
जो
सिमटते
होंगे
उन
में
वो
तो
मर
जाते
होंगे
Jaun Elia
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ये
काम
दोनों
तरफ़
हुआ
है
उसे
भी
आदत
पड़ी
है
मेरी
Shariq Kaifi
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आख़िर
में
यूँँ
हुआ
कि
मिरी
मात
हो
गई
मैं
उसके
साथ
थी
जो
ज़माने
के
साथ
था
Parul Singh "Noor"
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तुझे
छूकर
अभी
तक
होश
में
हूँ
कमी
कोई
कहीं
तो
रह
गई
है
Abhay Mishra
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'फ़ैज़'
थी
राह
सर-ब-सर
मंज़िल
हम
जहाँ
पहुँचे
कामयाब
आए
Faiz Ahmad Faiz
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पहले
पानी
को
और
हवा
को
बचाओ
ये
बचा
लो
तो
फिर
ख़ुदा
को
बचाओ
Swapnil Tiwari
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मैं
तो
मुद्दत
से
ग़ैर-हाज़िर
हूँ
बस
मेरा
नाम
है
रजिस्टर
में
याद
करती
हैं
तुझको
दीवारें
शक्ल
उभर
आई
है
पलस्तर
में
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Azhar Nawaz
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बस
ये
हुआ
कि
उस
ने
तकल्लुफ़
से
बात
की
और
हम
ने
रोते
रोते
दुपट्टे
भिगो
लिए
Parveen Shakir
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शब
की
आग़ोश
में
महताब
उतारा
उस
ने
मेरी
आँखों
में
कोई
ख़्वाब
उतारा
उस
ने
Azm Shakri
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जो
अभी
ख़ुद
कहीं
भी
नहीं
पहुँचे
हैं
आज
वो
रास्ते
मश्वरत
करते
हैं
Hrishita Singh
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रंजिशें
सारी
भूल
जाती
क्या
लौट
मुझ
तक
कभी
वो
आती
क्या
जल
गई
इंतिज़ार
में
इतना
अब
मुलाक़ात
भी
जलाती
क्या
जो
बिछड़
कर
गया
है
मुझ
सेे
तो
उस
को
भी
मेरी
याद
आती
क्या
मेरे
माज़ी
की
इतनी
वहशत
थी
सच
मैं
आख़िर
उसे
बताती
क्या
उसने
थामा
नहीं
था
हाथ
मिरा
आख़िरश
उस
सेे
मैं
छुड़ाती
क्या
वो
नईं
लौटा
वास्ते
मेरे
मैं
भी
उस
सेे
ख़ुशी
जताती
क्या
बे-नियाज़ी
है
उसका
बंदा
ही
तो
सदा
भी
असर
दिखाती
क्या
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Hrishita Singh
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वो
तो
किसी
को
भी
अपना
ख़ास
नहीं
रखता
प्यारा
भी
हो
कोई
तो
वो
पास
नहीं
रखता
Hrishita Singh
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सारे
आँगन
भी
चुप
हो
रहे
हैं
अब
तो
जंगल
भी
सब
रो
रहे
हैं
रूह
तो
कब
की
ही
मर
चुकी
है
अब
तो
हम
बस
बदन
ढो
रहे
हैं
सब
दरख़्तों
को
ये
काट
देते
फूल
गमलों
में
फिर
बो
रहे
हैं
रहते
कब
तक
उसी
वस्ल
में
हम
हिज्र
की
हम
वजह
हो
रहे
हैं
अब
नहीं
नींद
पूरी
मुनासिब
आधी
ही
नींद
बस
सो
रहे
हैं
सबकी
करते
थे
हम
ही
हिफ़ाज़त
अब
यहाँ
ख़ुद
ही
को
खो
रहे
हैं
ख़ाक
ही
तो
यहाँ
होते
हैं
सब
सब
सिकंदर
यहाँ
जो
रहे
हैं
ये
जो
आलम
मुनासिब
नहीं
था
हम
भी
इसकी
तरह
हो
रहे
हैं
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Hrishita Singh
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मेरी
दुनिया
जिस
में
सिमट
जाती
थी
तो
अब
उसके
कानों
में
बाली
न
हो
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Hrishita Singh
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