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Hrishita Singh
ranjishen saari bhool jaati kya
ranjishen saari bhool jaati kya | रंजिशें सारी भूल जाती क्या
- Hrishita Singh
रंजिशें
सारी
भूल
जाती
क्या
लौट
मुझ
तक
कभी
वो
आती
क्या
जल
गई
इंतिज़ार
में
इतना
अब
मुलाक़ात
भी
जलाती
क्या
जो
बिछड़
कर
गया
है
मुझ
सेे
तो
उस
को
भी
मेरी
याद
आती
क्या
मेरे
माज़ी
की
इतनी
वहशत
थी
सच
मैं
आख़िर
उसे
बताती
क्या
उसने
थामा
नहीं
था
हाथ
मिरा
आख़िरश
उस
सेे
मैं
छुड़ाती
क्या
वो
नईं
लौटा
वास्ते
मेरे
मैं
भी
उस
सेे
ख़ुशी
जताती
क्या
बे-नियाज़ी
है
उसका
बंदा
ही
तो
सदा
भी
असर
दिखाती
क्या
- Hrishita Singh
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जो
चराग़
सारे
बुझा
चुके
उन्हें
इंतिज़ार
कहाँ
रहा
ये
सुकूँ
का
दौर-ए-शदीद
है
कोई
बे-क़रार
कहाँ
रहा
Ada Jafarey
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कहीं
वो
आ
के
मिटा
दें
न
इंतिज़ार
का
लुत्फ़
कहीं
क़ुबूल
न
हो
जाए
इल्तिजा
मेरी
Hasrat Jaipuri
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ये
न
थी
हमारी
क़िस्मत
कि
विसाल-ए-यार
होता
अगर
और
जीते
रहते
यही
इंतिज़ार
होता
Mirza Ghalib
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चेहरे
को
आज
तक
भी
तेरा
इंतिज़ार
है
हम
ने
गुलाल
और
को
मलने
नहीं
दिया
Kunwar Bechain
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तुझे
कैसे
इल्म
न
हो
सका
बड़ी
दूर
तक
ये
ख़बर
गई
तिरे
शहर
ही
की
ये
शाएरा
तिरे
इंतिज़ार
में
मर
गई
Mumtaz Naseem
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जानता
है
कि
वो
न
आएँगे
फिर
भी
मसरूफ़-ए-इंतिज़ार
है
दिल
Faiz Ahmad Faiz
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जिस
दिन
तुम्हारे
ख़त
का
मुझे
इंतिज़ार
था
उस
दिन
तमाम
पंछी
कबूतर
लगे
मुझे
Ali Rumi
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वो
आ
के
लौट
भी
गया
जिसका
था
इंतिज़ार
और
मैं
घड़ी-घड़ी,
घड़ी
ही
देखता
रहा
Avtar Singh Jasser
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बे-ख़ुदी
ले
गई
कहाँ
हम
को
देर
से
इंतिज़ार
है
अपना
Meer Taqi Meer
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न
हुआ
नसीब
क़रार-ए-जाँ
हवस-ए-क़रार
भी
अब
नहीं
तिरा
इंतिज़ार
बहुत
किया
तिरा
इंतिज़ार
भी
अब
नहीं
तुझे
क्या
ख़बर
मह-ओ-साल
ने
हमें
कैसे
ज़ख़्म
दिए
यहाँ
तिरी
यादगार
थी
इक
ख़लिश
तिरी
यादगार
भी
अब
नहीं
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Jaun Elia
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आए
भी
तुम
थे
तो
चोर
दरवाज़े
से
ये
मिरी
ही
ख़ता
तुमको
दाख़िल
किया
Hrishita Singh
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दिल
लगा
ले
अब
और
वो
भी
किसी
से
अब
लगाने
की
मुझको
हिम्मत
नहीं
है
Hrishita Singh
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मेरी
दुनिया
जिस
में
सिमट
जाती
थी
तो
अब
उसके
कानों
में
बाली
न
हो
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Hrishita Singh
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साथ
मेरे
तो
वो
चल
रहा
पर
वो
मेरा
हम
सेफ़र
नहीं
Hrishita Singh
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वो
फ़ुर्क़त
अदा
कर
रहे
हैं
हम
अब
भी
वफा
कर
रहे
हैं
Hrishita Singh
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