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Hasrat Jaipuri
kahii vo aa ke mita den na intizaar ka lutf
kahii vo aa ke mita den na intizaar ka lutf | कहीं वो आ के मिटा दें न इंतिज़ार का लुत्फ़
- Hasrat Jaipuri
कहीं
वो
आ
के
मिटा
दें
न
इंतिज़ार
का
लुत्फ़
कहीं
क़ुबूल
न
हो
जाए
इल्तिजा
मेरी
- Hasrat Jaipuri
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लुत्फ़
आता
है
बहुत
सोच
के
मुझको
कि
रक़ीब
रंगत-ए-लब
को
तेरी
पान
समझते
होंगे
Ameer Imam
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तनक़ीद
न
तक़रार
बड़ी
देर
से
चुप
हैं
हैरत
है
मेरे
यार
बड़ी
देर
से
चुप
हैं
गूँगों
को
तकल्लुक़
के
मवाक़े
हैं
मुयस्सर
हम
माहिर-ए-गुफ़्तार
बड़ी
देर
से
चुप
हैं
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Ahmad Abdullah
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उस
की
ख़्वाहिश
पे
तुम
को
भरोसा
भी
है
उस
के
होने
न
होने
का
झगड़ा
भी
है
लुत्फ़
आया
तुम्हें
गुमरही
ने
कहा
गुमरही
के
लिए
एक
ताज़ा
ग़ज़ल
Irfan Sattar
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अलग
अंदाज़
हैं
दोनों
के
अपनी
बात
कहने
के
मैं
उसपे
शे'र
कहता
हूँ,
वो
ताना
मार
देती
है
Ankit Maurya
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वो
जो
इक
शख़्स
मुझे
ताना-ए-जाँ
देता
है
मरने
लगता
हूँ
तो
मरने
भी
कहाँ
देता
है
तेरी
शर्तों
पे
ही
करना
है
अगर
तुझको
क़ुबूल
ये
सहूलत
तो
मुझे
सारा
जहाँ
देता
है
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Azhar Faragh
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तन्हाई
ये
तंज
करे
है
तन्हा
क्यूँ
है
यार
कहाँ
है
आगे
पीछे
चलने
वाले
Vishal Singh Tabish
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मैं
पहले
हारी
थी
इस
बार
हारने
की
नहीं
तू
जा
रहा
है
तो
जा
मैं
पुकारने
की
नहीं
मुझे
पहाड़ों
पे
मौसम
का
लुत्फ़
लेना
है
मैं
तेरे
कमरे
में
सर्दी
गुज़ारने
की
नहीं
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Mumtaz Naseem
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ग़ुरूर-ए-लुत्फ़-ए-साक़ी
नश्शा-ए-बे-बाकी-ए-मस्ताँ
नम-ए-दामान-ए-इस्याँ
है
तरावत
मौज-ए-कौसर
की
Mirza Ghalib
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मुद्दत
के
बाद
उस
ने
जो
की
लुत्फ़
की
निगाह
जी
ख़ुश
तो
हो
गया
मगर
आँसू
निकल
पड़े
Kaifi Azmi
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तुम
इस
ख़मोश
तबीअत
पे
तंज़
मत
करना
वो
सोचता
है
बहुत
और
बोलता
कम
है
Nawaz Deobandi
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किस
वास्ते
लिक्खा
है
हथेली
पे
मिरा
नाम
मैं
हर्फ़-ए-ग़लत
हूँ
तो
मिटा
क्यूँँ
नहीं
देते
Hasrat Jaipuri
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मैं
उस
की
आँखों
से
छलकी
शराब
पीता
हूँ
ग़रीब
हो
के
भी
महँगी
शराब
पीता
हूँ
मुझे
नशे
में
बहकते
कभी
नहीं
देखा
वो
जानता
है
मैं
कितनी
शराब
पीता
हूँ
उसे
भी
देखूँ
तो
पहचानने
में
देर
लगे
कभी
कभी
तो
मैं
इतनी
शराब
पीता
हूँ
पुराने
चाहने
वालों
की
याद
आने
लगे
इसी
लिए
मैं
पुरानी
शराब
पीता
हूँ
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Hasrat Jaipuri
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ख़ुदा
जाने
किस
किस
की
ये
जान
लेगी
वो
क़ातिल
अदा
वो
क़ज़ा
महकी
महकी
Hasrat Jaipuri
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ये
किस
ने
कहा
है
मिरी
तक़दीर
बना
दे
आ
अपने
ही
हाथों
से
मिटाने
के
लिए
आ
Hasrat Jaipuri
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जब
प्यार
नहीं
है
तो
भुला
क्यूँँ
नहीं
देते
ख़त
किस
लिए
रक्खे
हैं
जला
क्यूँँ
नहीं
देते
Hasrat Jaipuri
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