kyun qatl ke armaan men aazaar uthaaye | क्यूँँ क़त्ल के अरमान में आज़ार उठाएँ

  - Hafeez Shahid
क्यूँँक़त्लकेअरमानमेंआज़ारउठाएँ
गर्दनमिरीहाज़िरहैवोतलवारउठाएँ
रोकेसेमिरीतब-ए-रवाँरुकसकेगी
रस्तेमेंमिरेलाखवोदीवारउठाएँ
जोदिलमेंतुम्हारेहैबताक्यूँँनहींदेते
सदमाजोउठानाहैतोयकबारउठाएँ
क्यूँँलोगहैंख़ामोशज़बूँ-हालपेअपने
आवाज़सर-ए-कूचा-ओ-बाज़ारउठाएँ
ख़ुदहीजोपस-ए-पर्दा-ए-असरारछुपेहैं
वोकैसेभलापर्दा-ए-असरारउठाएँ
नीलामजोकरतेहैंयहाँजिंस-ए-वफ़ाको
मुमकिनहीनहींनाज़-ए-ख़रीदारउठाएँ
येजुर्म-ए-मोहब्बतनहींवाइ'ज़कामुक़द्दर
येबार-ए-गुनाहहमसेगुनहगारउठाएँ
फिरतेहैंजोआज़ादउन्हेंकैसेख़बरहो
ज़िंदाँमेंजोतकलीफ़-ए-गिरफ़्तारउठाएँ
'शाहिद'यहीलिक्खाहैमुक़द्दरमेंहमारे
सदमातज़मानेमेंलगातारउठाएँ
  - Hafeez Shahid
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