gham-e-jaanaan ke siva kuchh ha | ग़म-ए-जानाँ के सिवा कुछ हमें प्यारा न हुआ

  - Faizi Nizam Puri
ग़म-ए-जानाँकेसिवाकुछहमेंप्याराहुआ
हमकिसीकेहुएकोईहमाराहुआ
क्याउसीकाहैवफ़ानाम-ए-मोहब्बतहैयही
मेहरबाँहमपेकभीवोसितम-आराहुआ
लाखतूफ़ान-ए-हवादिसनेक़दमथामलिए
मेरीग़ैरतकोपलटनाभीगवाराहुआ
दिलवहीदिलहैहक़ीक़तकीनज़रमेंदिल
सर्दजिसदिलमेंमोहब्बतकाशराराहुआ
ढूँढताआएगाकलअहल-ए-मोहब्बतकोयही
ग़मनहींआजज़मानाजोहमाराहुआ
अहल-ए-दुनियानेमसर्रतहीमसर्रतचाही
हमकोइसग़मकेसिवाकुछभीगवाराहुआ
जानदीहैदिल-ए-ख़ुद्दारनेकिसमुश्किलसे
आजबालींपेवोख़ुद-बीन-ओ-ख़ुद-आराहुआ
आँखसू-ए-हरम-ओ-दैरकभीउठजातीइश्क़कीराहमेंयेभीतोगवाराहुआ
ख़ाकछानीचमन-ओ-दश्तकीबरसों'फ़ैज़ी'
आहतस्कीन-ए-नज़रकोईनज़ाराहुआ
  - Faizi Nizam Puri
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