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Mehshar Afridi
teri KHataa nahin jo tu ghusse men aa gaya
teri KHataa nahin jo tu ghusse men aa gaya | तेरी ख़ता नहीं जो तू ग़ुस्से में आ गया
- Mehshar Afridi
तेरी
ख़ता
नहीं
जो
तू
ग़ुस्से
में
आ
गया
पैसे
का
ज़ो'म
था
तेरे
लहजे
में
आ
गया
सिक्का
उछालकर
के
तेरे
पास
क्या
बचा
तेरा
ग़ुरूर
तो
मेरे
काँसे
में
आ
गया
- Mehshar Afridi
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कम
अज़
कम
इक
ज़माना
चाहता
हूँ
कि
तुम
को
भूल
जाना
चाहता
हूँ
ख़ुदारा
मुझ
को
तन्हा
छोड़
दीजे
मैं
खुल
कर
मुस्कुराना
चाहता
हूँ
सरासर
आप
हूँ
मद्दे
मुक़ाबिल
ख़ुदी
ख़ुद
को
हराना
चाहता
हूँ
मेरे
हक़
में
उरूस-ए-शब
है
मक़्तल
सो
उस
से
लब
मिलाना
चाहता
हूँ
ये
आलम
है,
कि
अपने
ही
लहू
में
सरासर
डूब
जाना
चाहता
हूँ
सुना
है
तोड़ते
हो
दिल
सभों
का
सो
तुम
से
दिल
लगाना
चाहता
हूँ
उसी
बज़्म-ए-तरब
की
आरज़ू
है
वही
मंज़र
पुराना
चाहता
हूँ
नज़र
से
तीर
फैंको
हो,
सो
मैं
भी
जिगर
पर
तीर
खाना
चाहता
हूँ
चराग़ों
को
पयाम-ए-ख़ामुशी
दे
तेरे
नज़दीक
आना
चाहता
हूँ
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Kazim Rizvi
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ख़ुदी
को
कर
बुलंद
इतना
कि
हर
तक़दीर
से
पहले
ख़ुदा
बंदे
से
ख़ुद
पूछे
बता
तेरी
रज़ा
क्या
है
Allama Iqbal
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बे-ख़ुदी
ले
गई
कहाँ
हम
को
देर
से
इंतिज़ार
है
अपना
Meer Taqi Meer
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गर
अदीबों
को
अना
का
रोग
लग
जाए
तो
फिर
गुल
मोहब्बत
के
अदब
की
शाख़
पर
खिलते
नहीं
Afzal Ali Afzal
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उधारी
सर
से
ऊपर
बढ़
चुकी
है
हमारी
जान
जोखिम
में
पड़ी
है
हमीं
अपमान
सहकर
जी
रहे
हैं
अना
की
लाश
पंखे
पर
मिली
है
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Vikas Sahaj
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तू
मोहब्बत
नहीं
समझती
है
हम
भी
अपनी
अना
में
जलते
हैं
इस
दफा
बंदिशें
ज़ियादा
हैं
छोड़
अगले
जनम
में
मिलते
हैं
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Ritesh Rajwada
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ऐ
"दाग़"
बुरा
मान
ना
तू
उसके
कहे
का
माशूक
की
गाली
से
तो
इज़्ज़त
नहीं
जाती
Dagh Dehlvi
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बे-ख़ुदी
में
ले
लिया
बोसा
ख़ता
कीजे
मुआ'फ़
ये
दिल-ए-बेताब
की
सारी
ख़ता
थी
मैं
न
था
Bahadur Shah Zafar
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ग़ुरूर-ए-लुत्फ़-ए-साक़ी
नश्शा-ए-बे-बाकी-ए-मस्ताँ
नम-ए-दामान-ए-इस्याँ
है
तरावत
मौज-ए-कौसर
की
Mirza Ghalib
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निगल
ही
चुका
था
जफ़ा
का
निवाला
अना
फिर
तमाशा
नया
कर
रही
है
Amaan Pathan
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दबी
कुचली
हुई
सब
ख़्वाहिशों
के
सर
निकल
आए
ज़रा
पैसा
हुआ
तो
च्यूँँटियों
के
पर
निकल
आए
अभी
उड़ते
नहीं
तो
फ़ाख़्ता
के
साथ
हैं
बच्चे
अकेला
छोड़
देंगे
माँ
को
जिस
दिन
पर
निकल
आए
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Mehshar Afridi
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उसी
को
हम
सेफ़र
करना
पड़ेगा
नहीं
तो
दूर
तक
ख़ाली
सड़क
है
Mehshar Afridi
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इश्क़
में
दान
करना
पड़ता
है
जाँ
को
हलकान
करना
पड़ता
है
तजरबा
मुफ़्त
में
नहीं
मिलता
पहले
नुक़सान
करना
पड़ता
है
उसकी
बे-लफ़्ज़
गुफ़्तुगू
के
लिए
आँख
को
कान
करना
पड़ता
है
फिर
उदासी
के
भी
तक़ाज़े
हैं
घर
को
वीरान
करना
पड़ता
है
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Mehshar Afridi
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मैं
अगर
अपनी
जवानी
के
सुना
दूँ
क़िस्से
ये
जो
लौंडे
हैं
मेरे
पाँव
दबाने
लग
जाए
Mehshar Afridi
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इतना
मजबूर
न
कर
बात
बनाने
लग
जाए
हम
तेरे
सर
की
क़सम
झूठ
ही
खाने
लग
जाए
इतने
सन्नाटे
पिए
मेरी
समा'अत
ने
कि
अब
सिर्फ़
आवाज़
पे
चाहूँ
तो
निशाने
लग
जाए
मैं
अगर
अपनी
जवानी
के
सुना
दूँ
क़िस्से
ये
जो
लौंडे
हैं
मेरे
पाँव
दबाने
लग
जाए
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Mehshar Afridi
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