gulon ke chehra-e-rangeen pe vo nikhaar nahin | गुलों के चेहरा-ए-रंगीं पे वो निखार नहीं

  - Faizi Nizam Puri
गुलोंकेचेहरा-ए-रंगींपेवोनिखारनहीं
बहारआईमगरआलम-ए-बहारनहीं
जोहाथआताहैदामनतोछोड़देताहूँ
जुनूँ-नवाज़अभीमौसम-ए-बहारनहीं
किसीकीयादकाआलमपूछिएमुझसे
कभीक़रारहैदिलकोकभीक़रारनहीं
येबाँकपनयेअदायेशबाबकाआलम
तुमगएतोकिसीकाअबइंतिज़ारनहीं
बहारपरभीख़िज़ाँहीकारंगग़ालिबहै
हवाज़मानेकीगुलशनकोसाज़गारनहीं
हमारेसामनेवोहैंकहींयेख़्वाबहो
अबअपनीआँखोंपेभीहमकोए'तिबारनहीं
ख़ुदगएहैंसिमटकरनिगाहमेंजल्वे
विसाल-ए-दोस्तहैयेरंज-ए-इंतिज़ारनहीं
मिरामज़ाक़उड़ाताहैआईनालेकिन
मिरीहक़ीक़त-ए-ग़मउसपेआश्कारनहीं
हमारीआबला-पाईकाफ़ैज़क्याकहिए
वोकौनसाहैबयाबाँजोलाला-ज़ारनहीं
बुतोंकोपूजरहाहैतिरेतसव्वुरमें
गुनाहकरकेभी'फ़ैज़ी'गुनाहगारनहीं
  - Faizi Nizam Puri
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