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Deepak Jain Deep
shaam se zid par arde hain
shaam se zid par arde hain | शाम से ज़िद पर अड़े हैं
- Deepak Jain Deep
शाम
से
ज़िद
पर
अड़े
हैं
ख़्वाब
पलकों
पर
खड़े
हैं
ये
शिकन-आलूद
बिस्तर
नींद
के
टुकड़े
पड़े
हैं
रात
की
काली
रिदा
में
क़ीमती
मोती
जड़े
हैं
रात
भर
पागल
हवा
से
घर
के
दरवाज़े
लड़े
हैं
हो
सके
तो
सर
झुका
ले
वक़्त
के
तेवर
कड़े
हैं
- Deepak Jain Deep
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दौलत
शोहरत
बीवी
बच्चे
अच्छा
घर
और
अच्छे
दोस्त
कुछ
तो
है
जो
इन
के
बाद
भी
हासिल
करना
बाक़ी
है
कभी-कभी
तो
दिल
करता
है
चलती
रेल
से
कूद
पड़ूॅं
फिर
कहता
हूॅं
पागल
अब
तो
थोड़ा
रस्ता
बाक़ी
है
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Zia Mazkoor
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या'नी
कि
इश्क़
अपना
मुकम्मल
नहीं
हुआ
गर
मैं
तुम्हारे
हिज्र
में
पागल
नहीं
हुआ
वो
शख़्स
सालों
बाद
भी
कितना
हसीन
है
वो
रंग
कैनवस
पे
कभी
डल
नहीं
हुआ
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Kushal Dauneria
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मेरा
हाथ
पकड़
ले
पागल,
जंगल
है
जितना
भी
रौशन
हो
जंगल,
जंगल
है
Umair Najmi
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कोई
दीवाना
कहता
है
कोई
पागल
समझता
है
मगर
धरती
की
बेचैनी
को
बस
बादल
समझता
है
Kumar Vishwas
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बरस
रही
है
आँखें
हैं
ये
इनको
बादल
मत
कहना
मौत
हुई
है
दिल
की
मेरे
उसको
घाइल
मत
कहना
जीवन
भर
वो
साथ
रहेगा
प्यार
करेगा
बस
तुमको
मुझको
पागल
कह
देती
थी
उसको
पागल
मत
कहना
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Tanoj Dadhich
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दिल-ए-सोज़ाँ
को
भी
महका
रहे
हैं
हमें
जो
ख़्वाब
तेरे
आ
रहे
हैं
तेरे
शैदाई
पागल
हो
चुके
हैं
तिरी
तस्वीर
चू
में
जा
रहे
हैं
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Siddharth Saaz
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तुम
मुझे
छोड़
के
जाओगे
तो
मर
जाऊँगा
यूँँ
करो
जाने
से
पहले
मुझे
पागल
कर
दो
Bashir Badr
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इश्क़
में
पागल
हो
जाना
भी
फ़न
है
दोस्त
और
ये
दुख
की
बात
है
हम
फ़नकार
नहीं
Praveen Sharma SHAJAR
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वो
जो
पागल
था
अब
वो
कैसा
है
ऐसे
वो
पूछता
है
हाल
मेरा
Swapnil Tiwari
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दीवारों
से
मिल
कर
रोना
अच्छा
लगता
है
हम
भी
पागल
हो
जाएँगे
ऐसा
लगता
है
Qaisar-ul-Jafri
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खोने
का
मलाल
रह
गया
आइने
में
बाल
रह
गया
तेरे
बा'द
अपना
मश्ग़ला
ग़म
की
देख-भाल
रह
गया
तेरे
इस
हुनर
के
सामने
मेरा
सब
कमाल
रह
गया
पहले
तेरे
रंग
थे
वहाँ
मकड़ियों
का
जाल
रह
गया
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Deepak Jain Deep
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ये
उस
की
नींद
को
क्या
हो
गया
है
मिरी
आँखों
में
शब
भर
जागता
है
यहाँ
कैसे
रहें
महफ़ूज़
चेहरे
यहाँ
टूटा
हुआ
हर
आइना
है
यक़ीं
इस
बात
का
अब
तक
नहीं
है
कि
मेरी
प्यास
से
दरिया
बड़ा
है
दिमाग़-ओ-दिल
हैं
पहरे-दार
जैसे
जो
इक
सोए
तो
दूजा
जागता
है
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Deepak Jain Deep
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ऐसे
दरकिनार
हो
गए
हाशिए
के
पार
हो
गए
क्या
थी
वो
जुदाई
की
ख़बर
लफ़्ज़
तार
तार
हो
गए
बरसों
बा'द
ये
पता
चला
हम
कहीं
शिकार
हो
गए
तेरे
बा'द
क्या
बताएँ
हम
कैसे
बे-हिसार
हो
गए
इक
तिरी
सदा
ने
क्या
छुआ
दर्द
बे-क़तार
हो
गए
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Deepak Jain Deep
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अपने
आप
को
यूँँ
समझाते
रहते
हैं
उम्मीदों
के
पर
सहलाते
रहते
है
अपने
घर
में
घर
जैसी
इक
बात
तो
है
दुख-सुख
दोनो
आते
जाते
रहते
हैं
तस्वीरों
का
शौक़
कहाँ
तक
ले
आया
परछाईं
पे
अक्स
बनाते
रहते
हैं
अपना
ज़ब्त
ना
टूटे
इस
के
ख़ातिर
हम
दीवारों
को
दर्द
सुनाते
रहते
हैं
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Deepak Jain Deep
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अधूरा
ही
रहे
हर
रास्ता
तो
ना
पहुँचे
मंज़िलों
तक
सिलसिला
तो
जिसे
चाहें
वही
खो
जाए
हम
से
हमारे
साथ
फिर
ऐसा
हुआ
तो
जहाँ
आवारगी
बिखरी
पड़ी
हो
मैं
उस
रस्ते
से
मंज़िल
पा
गया
तो
तुझे
पाने
में
ख़ुद
को
भूल
बैठा
तुझे
पा
कर
भी
मैं
तन्हा
रहा
तो
यक़ीं
कर
के
तिरे
पीछे
चले
हैं
नज़र
आए
ना
फिर
भी
रास्ता
तो
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Deepak Jain Deep
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