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Deepak Jain Deep
khone ka malaal rah gaya
khone ka malaal rah gaya | खोने का मलाल रह गया
- Deepak Jain Deep
खोने
का
मलाल
रह
गया
आइने
में
बाल
रह
गया
तेरे
बा'द
अपना
मश्ग़ला
ग़म
की
देख-भाल
रह
गया
तेरे
इस
हुनर
के
सामने
मेरा
सब
कमाल
रह
गया
पहले
तेरे
रंग
थे
वहाँ
मकड़ियों
का
जाल
रह
गया
- Deepak Jain Deep
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हद
से
बढ़े
जो
इल्म
तो
है
जहल
दोस्तो
सब
कुछ
जो
जानते
हैं
वो
कुछ
जानते
नहीं
Khumar Barabankvi
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किस
तरह
जमा
कीजिए
अब
अपने
आप
को
काग़ज़
बिखर
रहे
हैं
पुरानी
किताब
के
Adil Mansuri
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रदीफ़ो-क़ाफ़िया-ओ-बह'र
का
भी
इल्म
है
लाज़िम
फ़क़त
दिल
टूट
जाने
से
कोई
शाइर
नहीं
बनता
Avtar Singh Jasser
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बेवफ़ाई
ने
तिरी
मुझको
दिया
है
ये
हुनर
बस
यार
दुनिया
में
कहाँ
हर
भाग्य
में
ये
फ़न
लिखा
है
Harsh saxena
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किताब
फ़िल्म
सफ़र
इश्क़
शा'इरी
औरत
कहाँ
कहाँ
न
गया
ख़ुद
को
ढूँढता
हुआ
मैं
Jawwad Sheikh
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हमारा
इल्म
बूढ़ा
हो
रहा
है
किताबें
धूल
खाती
जा
रही
हैं
Kaif Uddin Khan
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पुरानी
कश्ती
को
पार
लेकर
फ़क़त
हमारा
हुनर
गया
है
नए
खेवइये
कहीं
न
समझें
नदी
का
पानी
उतर
गया
है
Uday Pratap Singh
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इल्म
जब
होगा
किधर
जाना
है
हाए
तब
तक
तो
गुज़र
जाना
है
Madan Mohan Danish
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किताबें,
रिसाले
न
अख़बार
पढ़ना
मगर
दिल
को
हर
रात
इक
बार
पढ़ना
Bashir Badr
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अशआ'र
मिरे
यूँँ
तो
ज़माने
के
लिए
हैं
कुछ
शे'र
फ़क़त
उन
को
सुनाने
के
लिए
हैं
ये
इल्म
का
सौदा
ये
रिसाले
ये
किताबें
इक
शख़्स
की
यादों
को
भुलाने
के
लिए
हैं
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Jaan Nisar Akhtar
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हवाओं
में
बिखर
जाऊँ
तुझे
छू
कर
गुज़र
जाऊँ
तक़ाज़े
मुंतज़िर
होंगे
मैं
कैसे
अपने
घर
जाऊँ
उतारूँ
क़र्ज़-ए-आईना
तुझे
देखूँ
सँवर
जाऊँ
सफ़र
है
तेरी
मर्ज़ी
पर
सदा
दे
तो
ठहर
जाऊँ
वो
अगले
मोड़
पे
घर
है
वो
मोड़
आए
तो
घर
जाऊँ
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Deepak Jain Deep
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लम्हे
तेरी
जुदाई
के
हिस्से
हैं
तन्हाई
के
एक
ही
जैसे
क़िस्से
हैं
शोहरत
और
रुस्वाई
के
धड़कन
धड़कन
बजते
हैं
सातों
सुर
शहनाई
के
तेरे
ज़र्फ़
से
कितने
कम
पैमाने
गहराई
के
तेरी
याद
में
शामिल
ही
कुछ
झोंके
पुर्वाई
के
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Deepak Jain Deep
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तेरे
जल्वों
ने
कैसी
शर्त
रख
दी
की
ख़ुश्बू
देखने
की
शर्त
रख
दी
परिंदों
का
बसेरा
और
छतों
पर
तो
क्या
पेड़ों
ने
कोई
शर्त
रख
दी
मिरे
मालिक
ने
आँखें
तो
अता
कीं
मगर
इन
में
नमी
की
शर्त
रख
दी
परिंदों
की
उड़ानें
छीन
लीं
और
हदों
को
नापने
की
शर्त
रख
दी
सभी
थे
एकता
के
हक़
में
लेकिन
सभी
ने
अपनी
अपनी
शर्त
रख
दी
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Deepak Jain Deep
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ये
उस
की
नींद
को
क्या
हो
गया
है
मिरी
आँखों
में
शब
भर
जागता
है
यहाँ
कैसे
रहें
महफ़ूज़
चेहरे
यहाँ
टूटा
हुआ
हर
आइना
है
यक़ीं
इस
बात
का
अब
तक
नहीं
है
कि
मेरी
प्यास
से
दरिया
बड़ा
है
दिमाग़-ओ-दिल
हैं
पहरे-दार
जैसे
जो
इक
सोए
तो
दूजा
जागता
है
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Deepak Jain Deep
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अधूरा
ही
रहे
हर
रास्ता
तो
ना
पहुँचे
मंज़िलों
तक
सिलसिला
तो
जिसे
चाहें
वही
खो
जाए
हम
से
हमारे
साथ
फिर
ऐसा
हुआ
तो
जहाँ
आवारगी
बिखरी
पड़ी
हो
मैं
उस
रस्ते
से
मंज़िल
पा
गया
तो
तुझे
पाने
में
ख़ुद
को
भूल
बैठा
तुझे
पा
कर
भी
मैं
तन्हा
रहा
तो
यक़ीं
कर
के
तिरे
पीछे
चले
हैं
नज़र
आए
ना
फिर
भी
रास्ता
तो
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Deepak Jain Deep
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