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Deepak Jain Deep
hawaon men bikhar jaaun
hawaon men bikhar jaaun | हवाओं में बिखर जाऊँ
- Deepak Jain Deep
हवाओं
में
बिखर
जाऊँ
तुझे
छू
कर
गुज़र
जाऊँ
तक़ाज़े
मुंतज़िर
होंगे
मैं
कैसे
अपने
घर
जाऊँ
उतारूँ
क़र्ज़-ए-आईना
तुझे
देखूँ
सँवर
जाऊँ
सफ़र
है
तेरी
मर्ज़ी
पर
सदा
दे
तो
ठहर
जाऊँ
वो
अगले
मोड़
पे
घर
है
वो
मोड़
आए
तो
घर
जाऊँ
- Deepak Jain Deep
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जिधर
जाते
हैं
सब
जाना
उधर
अच्छा
नहीं
लगता
मुझे
पामाल
रस्तों
का
सफ़र
अच्छा
नहीं
लगता
Javed Akhtar
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'इंशा'-जी
उठो
अब
कूच
करो
इस
शहर
में
जी
को
लगाना
क्या
वहशी
को
सुकूँ
से
क्या
मतलब
जोगी
का
नगर
में
ठिकाना
क्या
Ibn E Insha
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मैं
लौटने
के
इरादे
से
जा
रहा
हूँ
मगर
सफ़र
सफ़र
है
मिरा
इंतिज़ार
मत
करना
Sahil Sahri Nainitali
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किया
बादलों
में
सफ़र
ज़िंदगी
भर
ज़मीं
पर
बनाया
न
घर
ज़िंदगी
भर
सभी
ज़िंदगी
के
मज़े
लूटते
हैं
न
आया
हमें
ये
हुनर
ज़िंदगी
भर
मोहब्बत
रही
चार
दिन
ज़िंदगी
में
रहा
चार
दिन
का
असर
ज़िंदगी
भर
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Anwar Shaoor
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हम-सफ़र
चाहिए
हुजूम
नहीं
इक
मुसाफ़िर
भी
क़ाफ़िला
है
मुझे
Ahmad Faraz
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किताब
फ़िल्म
सफ़र
इश्क़
शा'इरी
औरत
कहाँ
कहाँ
न
गया
ख़ुद
को
ढूँढता
हुआ
मैं
Jawwad Sheikh
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सफ़र
के
बाद
भी
ज़ौक़-ए-सफ़र
न
रह
जाए
ख़याल
ओ
ख़्वाब
में
अब
के
भी
घर
न
रह
जाए
Abhishek shukla
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दुश्मनी
का
सफ़र
इक
क़दम
दो
क़दम
तुम
भी
थक
जाओगे
हम
भी
थक
जाएँगे
Bashir Badr
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एक
मुद्दत
से
हैं
सफ़र
में
हम
घर
में
रह
कर
भी
जैसे
बेघर
से
Azhar Iqbal
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ज़िंदगी
अपना
सफ़र
तय
तो
करेगी
लेकिन
हम-सफ़र
आप
जो
होते
तो
मज़ा
और
ही
था
Ameeta Parsuram Meeta
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ये
उस
की
नींद
को
क्या
हो
गया
है
मिरी
आँखों
में
शब
भर
जागता
है
यहाँ
कैसे
रहें
महफ़ूज़
चेहरे
यहाँ
टूटा
हुआ
हर
आइना
है
यक़ीं
इस
बात
का
अब
तक
नहीं
है
कि
मेरी
प्यास
से
दरिया
बड़ा
है
दिमाग़-ओ-दिल
हैं
पहरे-दार
जैसे
जो
इक
सोए
तो
दूजा
जागता
है
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Deepak Jain Deep
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लम्हे
तेरी
जुदाई
के
हिस्से
हैं
तन्हाई
के
एक
ही
जैसे
क़िस्से
हैं
शोहरत
और
रुस्वाई
के
धड़कन
धड़कन
बजते
हैं
सातों
सुर
शहनाई
के
तेरे
ज़र्फ़
से
कितने
कम
पैमाने
गहराई
के
तेरी
याद
में
शामिल
ही
कुछ
झोंके
पुर्वाई
के
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Deepak Jain Deep
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तेरे
जल्वों
ने
कैसी
शर्त
रख
दी
की
ख़ुश्बू
देखने
की
शर्त
रख
दी
परिंदों
का
बसेरा
और
छतों
पर
तो
क्या
पेड़ों
ने
कोई
शर्त
रख
दी
मिरे
मालिक
ने
आँखें
तो
अता
कीं
मगर
इन
में
नमी
की
शर्त
रख
दी
परिंदों
की
उड़ानें
छीन
लीं
और
हदों
को
नापने
की
शर्त
रख
दी
सभी
थे
एकता
के
हक़
में
लेकिन
सभी
ने
अपनी
अपनी
शर्त
रख
दी
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Deepak Jain Deep
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तेरे
दर
तक
आऊँ
मैं
आईना
हो
जाऊँ
मैं
मंज़िल
अपनी
ढूँडे
वो
और
रस्ता
हो
जाऊँ
मैं
उस
का
कोई
ज़िक्र
ना
हो
और
रुस्वा
हो
जाऊँ
मैं
सब
के
दा'वे
वाजिब
हैं
किस
के
हिस्से
आऊँ
मैं
तन्हाई
को
साथ
लिए
भीड़
नहीं
हो
जाऊँ
मैं
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Deepak Jain Deep
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खोने
का
मलाल
रह
गया
आइने
में
बाल
रह
गया
तेरे
बा'द
अपना
मश्ग़ला
ग़म
की
देख-भाल
रह
गया
तेरे
इस
हुनर
के
सामने
मेरा
सब
कमाल
रह
गया
पहले
तेरे
रंग
थे
वहाँ
मकड़ियों
का
जाल
रह
गया
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Deepak Jain Deep
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